गदर राज्य क्रांति फरवरी 1915 में हुई भारतीय सेना में हुई एक अखिल भारतीय क्रांति थी जिसकी योजना गदर पार्टी में बनायी थी। यह क्रांति भारत से ब्रिटिश राज्य को समाप्त करने के उद्देश्य से 1914 से 1917 के बीच हुए अखिल भरतींय विद्रोहों में से सबसे बड़ी थी। गदर पार्टी के नेताओं ने निर्णय लिया कि अब वह समय आ गया है कि हम ब्रिटिश सरकार के खिलाफ उसकी सेना में संगठित विद्रोह कर सकते हैं। क्योंकि तब प्रथम विश्वयुद्ध धीरे-धीरे करीब आ रहा था और ब्रिटिश हकुमत को भी सैनिकों की बहुत आवश्यकता थी। गदर पार्टी के नेतृत्व ने भारत वापिस आने का निर्णय लिया।
अगस्त 1914 में बड़ी रैलियों और जनसभाओं का आयोजन किया गया। जिसमें सभी हिन्दुओं से कहा गया कि वे हिन्दुस्तान की ओर लौटें और ब्रिटिश हुकुमत के विरूद्ध सशस्त्र विद्रोह में भाग लें। इस प्रकार गदर पार्टी के अध्यक्ष सोहन सिंह भाकना ने भारत आने का निर्णय लिया। उन्होने बड़ी सावधानी से अपनी योजना को तैयार किया। ब्रिटिश हुकुमत के दुश्मनों से मदद प्राप्त करने के लिए गदर पार्टी ने बरकतुल्लाह को काबुल भेजा। कपूर सिंह मोही चीनी क्रान्तिकारियों से सहायता प्राप्त करने के लिए सन यात-सेन से मिले। सोहन सिंह भाकना भी टोकियो में जर्मन कांउसलर से मिले। तेजा सिंह स्वतंत्र ने तुर्कीश मिलिट्री अकादमी में जाना तय कर लिया ताकि प्रशिक्षण प्राप्त किया जा सके। गदर पार्टी के नेता पानी और जल के रास्ते भारत पहुंचना चाहते थे। इसके लिए कामागाटा मारू, एस.एस. कोरिया और नैमसैंग नाम के जहाजों पर हजारों गदर नेता चढकर भारत की ओर आने लगे लगभग 8 हज़ार गदर सदस्य भारत विद्रोह के लिए वापस आने लगे और उनका पहुुँचना 1916 तक तय था।
पंजाब के गवर्नर माइकल ओ डायर ने ब्रिटिश हुुकुमत से विशिष्ट कानूनी प्रावधानों की मांग की जिसके तहत कोर्ट में अपील की व्यवस्था न हो सके। अंग्रेज सरकार "डिफेन्स ऑफ इण्डिया रूल" का प्रावधान लेकर आयी जिसके तहत गदर नेताओं के विरूद्ध झटपट निर्णय हो सके। 13 सितम्बर 1914 को 24 गदर नेताओं को मौत की सजा सुनाई गई शेष को उम्र कैद दी गयी। 25 अक्टूबर 1915 को दूसरे लाहौर कांस्प्रेसी केस में 102 गदर नेताओं का मुकदमा प्रारम्भ हुआ, जिसका निर्णय 30 मार्च 1916 को हुआ, जिसके तहत 7 को फांसी की सजा दी गयी, 45 को उम्रकैद और अन्यों को 8 महीने से 4 वर्ष तक की कठोर सजा सुनाई गयी।