1935 से 1939 के काल की प्रमुख बात यह थी कि कांग्रेस विश्व की घटनाओं में बढ़ चढ़कर दिलचस्पी ले रही थी। 1885 में अपनी स्थापना के समय से ही कांग्रेस ने कहा था कि अफ्रीका और एशिया में ब्रिटेन के हितों के रक्षा करने के लिए भारतीय सेना और भारत के संसाधनों का प्रयोग न किया जाए। फरवरी 1927 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अध्यक्ष ओर से जवाहरलाल नेहरु ने ब्रुसेल्स में अयोजित सम्मेलन में भाग लिया इस सम्मेलन का आयोजन आर्थिक या राजनीतिक साम्राज्यवाद से पीड़ित और क्रांतिकारियों ने किया था।
नेहरू इसी सम्मेलन में स्थापित 'लीग अगेंस्ट इम्पीरियलिज्म' की 'एक्जीक्यूटिव काउंसिल' के भी सदस्य चुने गए। इस समय कांग्रेस और मुस्लिम लीग एक दूसरे के थोड़ा करीब आये। क्योंकि कुछ कारणों जैसे- मुस्लिम राष्ट्र टर्की का रूस व इंग्लेण्ड द्वारा विरोध, बंगाल विभाजन के समय मुसलमानों की राय न लेना तथा कुछ मुसलमान नवयुवकों के हृदय में राष्ट्रीय भावना जागृत होने आदि से मुसलमान भी अंग्रेजों से रुष्ट हो गए। बाद में जब जिन्ना लीग के सभापति बने तो तय हुआ कि लीग व कांग्रेस अब मिल कर साथ-साथ काम करेंगे।
राष्ट्रीय कांग्रेस को पूरा पूरा विश्वास था कि भारत का भविष्य उस संघर्ष से घनिस्तपूर्ण जुडॉ हुआ है। 23 अप्रैल, 1916 को बाल गंगाधर तिलक ने पूना में “होमरुल लीग‘ की स्थापना की। इसके छः महीने बाद श्रीमती एनीबेसेन्ट ने भी मद्रास में ‘अखिल भारतीय होमरुल लीग’ की स्थापना की। इन दोनों लोगों का उद्देश्य एक ही था। अत: दोनों ने परस्पर सहयोग से काम किया। दिसम्बर, 1919 में कांग्रेस तथा लीग ने सुधारों की एक सामान्य योजना स्वीकार की तथा उसे जन-सामान्य में लोकप्रिय बनाने के लिए स्वराज्य आन्दोलन का उपयोग करने का निश्चय किया।