1942 के युद्ध में जापान की निरंतर विजय तथा मित्र राष्ट्रों की पराजय से विवश होकर जापान की रंगून पर अधिकार के बाद 11 मार्च,1942 को भारतीय समस्याओं के समाधान के लिए स्टैफोर्ड किप्स सर को भारत भेजा गया । हाउस ऑफ कॉमंन्स के नेता सर
के द्वारा रखे गए प्रस्ताव केवल उन्हीं तत्वों की पुनरावृत्ति थी, जो पहले कहे जा चुके थे। इन प्रस्तावों में कुटिलता से भविष्य में भारत विभाजन का इशारा भी था। जवाहरलाल नेहरू क्रिप्स को शैतान के वकील की संज्ञा देते हुए स्पष्ट किया कि " किप्स के प्रस्ताव न केवल पाकिस्तान स्वीकृत अथवा एक विशेष बंटवारे की बात स्वीकृत करते थे, बल्कि इसमें असंख्य की बंटवारे की संभावनाए थी।" स्वीकार करो या छोड दो के सिद्धांत पर आधारित क्रिप्स प्रस्ताव के लिए था। गाधी ने कहा था । कि किप्स प्रस्ताव दिवालिया बैक के नाम भविष्य के तिथि में भुनाए जा सकने वाले चैक हैं।" अप्रैल,1942 मे जब कृष्ण सिस्टमंडल को अचानक वापस बुला लिया गया तो यह स्पष्ट हो गया कि यह सारा ढोंग भारत की स्वाधीनता की मांग के प्रति सहानुभूति रखने वाले मित्र राष्ट्रों की आंखों में धूल झोंकने के लिए किया गया था। ब्रिटिश शासकों एवं भारतीय नेताओं के बीच खाई चौड़ी हो गई थी तथा सारे देश में सरकार के विरुद्ध और असंतोष की लहर तीव्र हो चुकी थी ।