वह भूषण जो घर के भीतर ही दबोच लेता है

भारत में वायु प्रदूषण के बढ़ने के स्तर ने एक बार फिर बड़े पैमाने पर हम सबका ध्यान खींचा है। मगर राजधानी के जिन घरों में खाना पकाने के लिए फोर्स बायोमास यानी लकड़ी कोयला आदि का इस्तेमाल होता है और धुआं निकलने की पर्याप्त जगह नहीं होती है वहां सामान्य दिनों में भी इस स्तर का वायु प्रदूषण खासतौर से पीएम 2.5 पसरा रहता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि खाना पकाने के दौरान होने वाले घरेलू वायु प्रदूषण से भारत में 1300000 लोगों की समय पूर्व मौत हो जाती है इसके अलावा देशभर में फैले करीब 30 फ़ीसदी वायु प्रदूषण की वजह भी यही है घरेलू वायु प्रदूषण का एक प्रमुख घटक पीएम 2.5 है स्थानीय और क्षेत्रीय जलवायु परिवर्तन को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। इन तमाम समस्याओं को देखते हुए 2015 में पेरिस जलवायु समझौते के तहत भारत की स्वैच्छिक प्रतिबद्धता को सकारा करने के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार ने प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना की शुरुआत की जिसका उद्देश्य है गरीब परिवार को एलपीजी सिलेंडर मुहैया कराना अब तक 50000000 परिवार इस योजना का लाभ आ चुके हैं। इसके बावजूद इसके कई घरों में आज भी स्टोर और केरोसिन तेल का इस्तेमाल होता रहा है यहां तक कि जिनके पास एलपीजी कनेक्शन है वहां भी या तो लगातार या फिर खास मौकों पर ठोस बायोमास जलाए जाते हैं ऐसा गरीब और अमीर दोनों तबकों के परिवार में होता है।

आटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन आफ इंडिया और एनर्जी एंड रिसोर्सेस इंस्टीट्यूट की एक हालिया अध्ययन ने बताया गया है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में करीब 3000000 परिवार बायोमास ईंधन का इस्तेमाल करते हैं जहां या जानना भी जरूरी है कि परंपरागत और पोस्ट बायोमास को सिर्फ खाना पकाने के लिए नहीं लाया जाता। इसका उपयोग से मवेशियों के मक्खियों को भगाने के लिए आहार पानी गर्म करने जैसे कामों के लिए भी किया जाता है हालांकि ऐसा लंबे समय से होता आ रहा है और यह हर कोई जानता है कि फोकस आमतौर पर खाना पकाने को बदलने पर दिया गया है इसका उपयोग सिर्फ खाना पकाने के लिए होता है घरेलू प्रदूषण का मसला देखा जाता है अधिकांश में भी खाना पकाने वालों का भी इकट्ठा किया जाता है।

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