19वीं शताब्दी में भारत में चल रहे विभिन्न धर्म एवं समाज सुधार आंदोलन उसे सिख समुदाय भी अछूता ना रह सका। तथा इसमें भी विभिन्न समाज एवं धर्म सुधार आंदोलन प्रारंभ हुए ।1873 में अमृतसर में सिंह सभा आंदोलन प्रारंभ हुआ। इसके मुख्य दो उद्देश्य थे -सिक्कों के लिए आधुनिक पाश्चात्य शिक्षा की उपलब्धता सुनिश्चित करना तथा सिख धर्म के हितों को नुकसान पहुंचाने वाली ईसाई मिशनरियों में हिंदू रूढ़िवादियों के विरुद्ध संघर्ष करना ,अपने प्रथम उद्देश्य की पूर्ति के लिए सभा ने पूरे पंजाब में खालसा स्कूलों की स्थापना की लेकिन सिंह सभा के प्रयासों में गतिशीलता तब आई जब अकाली आंदोलन प्रारंभ हुआ ।दूसरे, गुरु की शिक्षाओं के विरुद्ध प्रत्येक बात को नकार दिया गया और सिद्धांतों के साथ संगत समझे जाने वाले स्थलों प्रथाओं को स्थापित किया गया अकाली आंदोलन सिंह सभा आंदोलन की एक शाखा थी।इनका मुख्य उद्देश्य गुरुद्वारों का प्रबंध सुधारना था ।वह गुरुद्वारों को उनका सीमाओं से मुक्त करना चाहते थे जो सरकार के भ्रष्ट कार्यों में लिप्त थे। उन्होंने एक नया असहयोग अहिंसक आंदोलन प्रारंभ किया लेकिन सफलता तब मिली जब 1922 में बहुप्रतीक्षित एवम लोकप्रिय सिक्ख गुरुद्वारा एक्ट पास हुआ।इस एक्ट द्वारा गुरुद्वारों का प्रबंध सिक्खो की संस्था शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी को सौंप दिया गया। अकाली आंदोलन सांप्रदायिक नहीं था। कालांतर में भारतीय स्वतंत्र आंदोलन में भी समय-समय पर अकाली नेताओं ने ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध आवाज उठाई तथा राष्ट्रीय स्वतंत्र सराहनीय भूमिका अदा की।