अबुल फजल की पुरखे 15 वी शताब्दी के आसपास नागौर में बस गए थे यहां पर 1506 में अबुल फजल की पिता शेख मुबारक का जन्म हुआ शेख मुबारक को अपने जमाने की बड़े-बड़े विद्वानों के साथ बैठने का मौका मिला जैसे शेख उमर शेख युसूफ अमीर उद्दीन सफरी अबुल फजल का जन्म आगरा में 1551 में हुआ उसने अपने पिता सीट मुबारक से ही विद्या प्राप्त की शुरू से ही जहीन और मेहनती होने के कारण 15 वर्ष की आयु में उसने परंपरागत शिक्षा प्राप्त कर ली अरबी की ठोस ज्ञान के कारण उसने धर्म और दर्शन शास्त्र में महारत हासिल की शुरू से ही उसने अलग-अलग धर्मों की तुलना पर विशेष ध्यान दिया 15 से 25 वर्ष की आयु तक उसने धार्मिक बर्ताव में निरंतर भाग लिया जिससे उसमें सहनशीलता और उदारता पैदा हुई हालात ने भी उसकी विचारधारा को बड़ी हद तक प्रभावित किया अपने माता पिता की मृत्यु के पश्चात नागौर से अहमदाबादजा बसा था जहां मेहनती आंदोलन का बड़ा जोड़ था सीक मुबारक भी उसकी प्रभाव से ना बच सका या आंदोलन समकालीन मुस्लिम समाज की बुराइयों की विरोध में चलाया गया था जौनपुर की सैयद मोहम्मद ने राजनीति से अलग रहकर इस आंदोलन का प्रचार किया लेकिन इस आंदोलन को राजनीतिक शक्तियों ने कुचलने की पूरी कोशिश की क्यों की मेहंदी का नजरिया धर्म और राजनीति दोनों से जुड़ा हुआ था हदीस के अनुसार मेहंदी धर्म और राजनीति दोनों को सुधरेगा इससे शासकों को उसकी तरफ से खतरा पैदा हो गया जब जब किसी ने मेहंदी होने का दावा किया राजनीतिक शक्तियों ने उसका दमन कर दिया अकबर के काल में विशेषकर 15 साल के बाद जब बैरन खान की मन की बात शेख अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह सुल्तानपुरी जैसे कट्टर उठाने का मौका मिला कि उसे भी परेशानी में फंसा दिया उसकी गिरफ्तारी के आदेश दिए मखदूम उल मुल्क दुश्मन हो गया और लंबे समय तक का सामना करना पड़ा अबू फजल ने इतिहास से संबंधित अरबी और फारसी की सारी महत्वपूर्ण किताबों का अध्ययन किया था सारे सरकारी रिकॉर्ड उसके इस्तेमाल में थी तारीख ए अल्फी के लिए जमा की गई सामग्री भी मौजूद थी अबू फजल ने शाही फरमान और दूसरे दस्तावेजों का भी इस्तेमाल किया सरकार के उच्चाधिकारियों और दूसरे बड़े लोगों को आदेश दिया गया कि वे अपनी याददाश्त के सहारे बीती बातों का ब्यौरा तैयार करके दरबार भेजिए खुद भी पूछताछ की जो कुछ उसके नौकरी में आने के बाद हुआ उसकी पूरी जानकारी अबू फजल को प्राप्त थी बहुत से खास मामलों में उसने अकबर को सुझाव दिए थे इस तरह बहुत सी नीतियों की भीतरी जानकारी भी उसे हासिल थी जिन बातों पर मतभेद पाया जाता था उनकी सही जानकारी हासिल करने के लिए अबुल फजल ने ज्यादा से ज्यादा लोगों से पूछताछ की जिस मत का समर्थन ज्यादा लोगों ने किया उसे सही माना गया अगर दोनों तरफ मतों की संख्या 1 होती थी तो निर्णय अकबर को लेना होता था इस तरह गलतियों की जिम्मेदारी अबुल फजल पर कम आती है अबू फजल का मकसद अकबर की जीवन की रुहानी पहलुओं को उजागर करना था अकबर की सुलह कुल की नीति को लोगों तक पहुंचाना और बादशाह की व्यक्तित्व की महानता को बनवा देना भी इस किताब के उद्देश्यों में शामिल है अबुल फजल का विचार था की बादशाहत खुदा की देन है इसीलिए उसने चंगेज खान को एक खासी रूहानी अंदाज में बयान किया है अकबर अबुल फजल की नजर में बादशाह से कई महान था उसने उसे इंसान ए कामिल माना है जिस से कोई गलती नहीं हो सकती थी और जिसके सामने एक मिशन था 7 साल की मेहनत की बात अबू फजल ने 1597 से 1598 में अकबरनामा पूरा करके अकबर के सामने पेश किया या तीन जिलों में बटा हुआ है तीसरी जल्द आईने अकबरी है।