सूरत विभाजन

स्वतंत्र आंदोलन के प्रथम चरण में जबकि क्रांतिकारी आतंकवाद धीरे-धीरे पकड़ रहा था, दिसंबर 1906 में कांग्रेस का सूरत विभाजन हुआ। इसका प्रमुख कारण कांग्रेसमें दो विपरीत विचारधाराओं का उदय था। 1905 में जब कांग्रेस का अधिवेशन गोपाल कृष्ण गोखले की अध्यक्षता में बनारस में संपन्न हुआ तो उदार वादियों एवं उग्रवादियों के मतभेद खुलकर सामने आए। इस अधिवेशन में बाल गंगाधर तिलक ने ब्रिटिश सरकार के प्रति उदार एवं सहयोग की नीति की कटु आलोचना की। तिलक की मंशा थी की स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन का पूरे बंगाल तथा देश के अन्य भागों में तेजी से विस्तार किया जाए, तथा इसमें अन्य संस्थाओं को सम्मिलित कर इसे राष्ट्रव्यापी आंदोलन का स्वरूप दिया जाए। जबकि उदारवादी इस आंदोलन को केवल बंगाल तक ही सीमित रखना चाहते थे, तथा अन्य संस्थाओं को इस आंदोलन में सम्मिलित करने के पक्ष में नहीं थे। उग्रवादी चाहते थे कि बनारस अधिवेशन में उनके प्रस्ताव को सर्वसम्मति से स्वीकार किया जाए ,जबकि उधार वादियों का मत था कि बंगाल विभाजन का विरोध संवैधानिक तरीके से किया जाए, तथा उन्होंने भी सरकार के साथ सहयोग करने के लिए समर्थन नहीं किया। बीच का रास्ता निकालते हुए एक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसमें कर्जन की प्रतिक्रियावादी नीतियों तथा बंगाल विभाजन की आलोचना की गई। तथा स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन का समर्थन किया गया। इससे कुछ समय के लिए कांग्रेस का विभाजन टल गया।
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