मुगल साम्राज्य की आधारशिला रखने वाले जहीरूद्दीन मोहम्मद बाबर ने इसमें अपनी जीवन संबंधी घटनाओं को खुद लिखा है इसे तुजुक ए बाबरी भी कहा जाता है या किताब तुर्की भाषा में लिखी गई थी शेखजेतुतदीन ख्वाजा ने जो बाबर का सदर उस सदर था। इस किताब का फारसी में अनुवाद किया लेकिन इसमें सिर्फ खंनवा तक की लड़ाई के हालात हैं 1583 में अकबर के आदेशानुसार खाने खाना ने इसका फिर अनुवाद 1589 - 90 में किया ।अंग्रेजी में इसका अनुवाद 1826 में A. S. Beveridge ने किया इसका दूसरा अनुवाद 1905 में किया जो दो भागों में है।
बाबरनामा में 1504 से 1529 तक की यानी उसकी मौत से 1 साल पहले की हालात मौजूद हैं स्कूल तीन भागों में बांटा जा सकता है पहला भाग बाबर के सरगना के तख्त पर बैठने से शुरू होता है और उसकी आखिरी बार समरकंद छोड़ने पर खत्म होता है दूसरा भाग उसके भागने से शुरू होकर हिंदुस्तान की आखिरी हमले पर खत्म होता है और तीसरा हिस्सा हिंदुस्तान के हालात से संबंधित है बाबर ने हिंदुस्तान का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है यहां की राजनीतिक दशा प्राकृतिक दृश्य फसलें फल फूल और सब्जियां यहां की बसने वाले तिजारा और उत्पादन वगैरह का विस्तार से विवरण दिया गया है विदेशी होने की वजह से बाबर ने उन तमाम चीजों को अपनी डायरी में जगह दी है उसके लिए नई थी, मगर एक हिंदुस्तानी के लिए साधारण इसलिए वह लिखता है कि" हिंदुस्तान एक विचित्र देश है और हमारे इलाकों को देखते हुए एक नई दुनिया है इसके पहाड़, दरिया ,जंगल और रेगिस्तान इसके कस्बे इसकी खेती इसके जानवर और पौधे इसके लोग और उनकी भाषाएं इसकी वर्षा और हवाएं सब की सब भिन्न है।"