यह भी एक प्रकार का मुस्लिम धार्मिक आंदोलन था। जिसे मुस्लिम धर्म के रूढ़िवादी उलेमाओं द्वारा प्रारंभ किया गया था। इस आंदोलन के दो मुख्य उद्देश्य थे -1.कुरान और हदीस की शिक्षाओं का मुसलमानों की मध्य प्रचार-प्रसार करना एवं,2. विदेशी आक्रांता ओं एवं गैर मुसलमानों के विरुद्ध धार्मिक युद्ध जिहाद को प्रारंभ करना। देवबंद स्कूल की स्थापना तत्कालीन संयुक्त प्रांत के सहारनपुर जिले में देवबंद नामक स्थान में 1866 में मोहम्मद कासिम नैनोटवी एवं रशीद अहमद गंगोही ने संयुक्त रूप से की थी। यह दोनों मुस्लिम समुदाय की धार्मिक नेता थे। यह आंदोलन अलीगढ़ आंदोलन के विरुद्ध था। इसने अलीगढ़ आंदोलन द्वारा मुस्लिम समाज का पाश्चात्य करने एवं उदार रुख अपनाने के रवैए का कड़ा विरोध किया। तथा मुस्लिम समुदाय का नैतिक एवं धार्मिक उत्थान करने की वकालत की। इसने अलीगढ़ आंदोलन के अनुयायियों द्वारा अंग्रेज सरकार का समर्थन करने के कार्य की भी निंदा की। राजनीतिक मोर्चे पर देवबंद स्कूल ने 1888 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गठन का स्वागत किया। तथा सर सैयद अहमद खान की संगठन संयुक्त राष्ट्रवादी संघ एवं मोहम्मद एसोसिएशन के खिलाफ फतवा जारी किया। सर सैयद अहमद खान की मुस्लिम समाज सुधार हेतु किए जा रहे कार्यों का कड़ा विरोध था तथा इसने सैयद अहमद के प्रयासों को मुस्लिम समाज के लिए आत्मघाती बताया। मोहम्मद उल हसन ने अपने नेतृत्व में देवबंद स्कूल के धार्मिक विचारों को नया राजनीतिक स्वरूप प्रदान किया। उन्होंने इस्लामिक सिद्धांत राष्ट्रवादी प्रेरणा सराहनीय प्रयास किए देवबंद स्कूल के समर्थक शिब्ली नोमानी का मत था कि शिक्षा की पद्धति में अंग्रेजी एवं यूरोपीय विज्ञान का भी सम्मिलन किया जाए।