सन् 1968 जब भारत में पहली बार 120 लाख टन गेहूं से 50 लाख की बढ़त से कुल 170 लाक टन गेहूं पैदा हुआ, तो अमरीकी वैज्ञानिक डॉ ० विविलियम गाड ने इसे हरित क्रांति की संख्या प्रदान की पलत 1960 के दशक के मध्य में मैक्सिको से लाए गए गेहूं की उन्नत बीजों से भारतीय कृषि वैज्ञानिक ने ब्रीडिंग (संस्करण) द्वारा नई-नई गेहूं की अधिक उपज देने वाली प्रजातियों विकसित की, जिनकी प्रति हेक्टेयर उपज क्षमता 60 से 65 कुंटल थी । ऐसे ही स्थित धान की प्रजातियों की भी रहे, जिसमें देश में 1970 के दशक के मध्य कृषि में 'हरित क्राति (Green Revolution) आई और परिणाम स्वरुप खदान में आत्मनिर्भरता प्राप्त हुई। इसका श्रेय नोबेल पुरस्कार से सम्मानित एकमात्र किसी वैज्ञानिक डॉ० नोरमान बोरलाग को तो है ही तथा भारती परिपेक्ष्य में डा.एम.एस स्वामिनाथन को भी जाता है।