जिस समय साइमन कमीशन के बाय काट का आंदोलन सारे देश में चल रहा था, बारदोली में 1928 में किसानों ने लगान वृद्धि के विरोध में अपना आंदोलन चला रखा था। यह आंदोलन लगान अभीवृद्धि के विरोध में प्रारंभ किया गया था।
मुंबई प्रदेश की सरकार ने 30 जून 1927 को बारदोली तालुके का लगान 30% तक बढ़ा दिया था, जिसके विरोध में यहां के किसानों ने आंदोलन प्रारंभ कर दिया। इन लोगों ने प्रारंभ में सरकार के राजस्व अधिकारी के पास एक शिष्टमंडल भेज कर अपनी तकलीफ सुनाई और लगान वृद्धि को अनुचित बताते हुए उसमें कमी करने की अपील की।
सरकार ने 1927 में 30% बढ़ोतरी को घटाकर 21.97% कर दिया लेकिन यह रियायत मामूली थी और किसान इससे संतुष्ट नहीं थे। सरकार का कोई प्रभाव नहीं पड़ा, तो फिर मेहता बंधु कुमार जी तथा कल्याण जी के द्वारा बल्लभ भाई पटेल को इस आंदोलन का नेतृत्व करने को आमंत्रित किया गया। गांधी जी की इजाजत से पटेल ने इस आंदोलन का नेतृत्व संभाला ।
बारदोली के किसानों के समर्थन में देश के कोने-कोने में सभाएं हुई। मुंबई और संयुक्त प्रदेश की सभाओं में किसानों ने ऐलान किया कि, वे बारदोली के किसानों का अनुकरण कर लगाने वृद्धि को रोकेंगे। गांधी जी की अपील पर 12 जून 1928 को सारे देश में बारदोली दिवस मनाया गया।
इस आंदोलन की तीव्रता को देखते हुए एक न्यायिक अधिकारी ब्लूम फील्ड और एक राजस्व अधिकारी मैक्सवेल ने संपूर्ण मामलों की जांच कर 30% लगान वृद्धि को गलत ठहराते हुए उसे घटाकर 6.3% कर दिया और अंततः जुलाई 1928 में यह आंदोलन बंद कर दिया गया।
11-12 अगस्त 1928 को सारे गुजरात में बारदोली के विजय का उत्सव मनाया गया। महात्मा गांधी की जय और सरदार पटेल की जय के नारे के साथ सारा गुजरात गूंज उठा। बारदोली के सत्याग्रह आंदोलन के सफलतापूर्वक नेतृत्व करने की वजह से वहां की महिलाओं ने और कुछ विद्वानों के अनुसार महात्मा गांधी ने वल्लभ भाई पटेल को 'सरदार' की उपाधि प्रदान की थी। बारदोली सत्याग्रह के समय ही गांधी जी ने काली पराज नामक आदिवासी जाति का नाम बदलकर रानी पराज रख दिया था।