व्यक्तिगत सत्याग्रह(1940)

अगस्त प्रस्ताव के बाद की परिस्थितियों में जो प्रगति हुई उसके पश्चात सरकार ने अड़ियल रवैया अपना लिया तथा घोषित किया कि कांग्रेस जब तक मुस्लिम नेताओं के साथ किसी तरह के समझौते को मूर्त रूप नहीं देती तब तक भारत में किसी प्रकार का संवैधानिक सुधार संभव नहीं है। सरकार एक के बाद एक अध्यादेश जारी करती जा रही थी। तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रेस की स्वतंत्रता तथा सभा करने एवं संगठन बनाने का अधिकार जैसे अधिकार धड़ाधड़ छीन रही थी। 1940 के अंत में कांग्रेस ने एक बार पुनः गांधी जी से कमान संभालने का आग्रह किया। इसके पश्चात गांधी जी ने ऐसे कदम उठाने प्रारंभ कर दिए, जिससे उनकी अपनी व्यापक गणित के अंतर्गत जन संघर्ष की भूमिका का निर्माण होता। उन्होंने व्यक्तिगत आधार पर सीमित सत्याग्रह प्रारंभ करने का निश्चय किया। इस रणनीति के तहत उन्होंने तय किया कि हर इलाके में कुछ चुने हुए लोग व्यक्तिगत सत्याग्रह प्रारंभ करेंगे। 17 अक्टूबर को विनोबा भावे पहले सत्याग्रही और इसके बाद जवाहरलाल नेहरू दूसरे। मई 1941 तक लगभग 25000 सत्याग्रहियो को सविनय अवज्ञा के लिए सरकार द्वारा दंडित किया जा चुका था। दिसंबर 1941 में कांग्रेस के नेताओं को रिहा कर दिया गया। यह नेता भारतीय सीमाओं की रक्षा करने तथा मित्र राष्ट्रों की सहायता करने को आतुर थे। कांग्रेस कार्यसमिति ने महात्मा गांधी तथा नेहरू जी की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया। जिसमें भारत की रक्षा के लिए सरकार को इस शर्त पर सहयोग देने की पेशकश की गई कि यदि युद्ध के पश्चात भारत को पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की जाएगी तथा बिटेन तुरंत ठोस रूप में सत्ता के स्थानांतरण पर राजी हो जाए यह वही समय था जब गांधी जी ने जवाहरलाल नेहरू को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था।
Posted on by