सैयद बंधुओ का मूल्यांकन

कम से कम सैयद बंधुओं के साथ फर्रूखसियर ने पाप किया सम्राट की निरंतर सभी षड्यंत्रो के कारण भी लोग निराशा की चरम सीमा तक पहुंच गए थे और उनकी सुरक्षा सम्राट को समाप्त करने में ही थी। सैयद बंधुओं ने अपने प्रतिद्वंद्वियों को निरस्त कर दिया और इसके पश्चात होने वाले सम्राटों को उन्होंने लगभग शून्य के बराबर कर दिया।

सैयद बंधु हिंदुस्तानी मुसलमान थे और भी इसमें गौरव अनुभव करते थे। वे तूरानी दल की श्रेष्ठता को स्वीकार करने को उद्धत नहीं थे और ना ही अपने आप में हीन त्व की भावना का अनुभव करते थे। यह कहना तो बहुत कठिन है कि वह कैसा शासन चाहते थे। जो मुगल ना हो अथवा विदेशी शासकों के स्थान पर एक राष्ट्रीय शासन चाहते थे सैयद बंधु धार्मिक क्षेत्र में सहिष्णुता की नीति का अनुसरण करते थे जो कि अकबर के दिनों का स्मरण करा देती थी इससे प्रभावित होकर उन्होंने 1713 में जजिया हटा दिया था और जब वह पुनः लगाया गया तो पुनः हटा लिया गया उन्होंने हिंदुओं का विश्वास जीता और उन्हें ऊंचे पद प्रदान किए रत्नचंद की दीवान के रूप में नियुुुक्ति इस बात की घोतक थी। उन्हें राजपूतों को भी अपनी ओर मिला लिया और महाराजा अजीतसिंह को विद्रोही के स्थान पर मित्र बना लिया यहां तक कि अजीत सिंह ने अपनी बेटी का विवाह फर्रूखसियर से कर दिया सैयद बंधुओं ने जाटों से भी सहानुभूति और उन्हीं के हस्तक्षेप से जाटों ने थूरी दुर्ग का घेरा उठा लिया और चूड़ामण अप्रैल 1718 में दिल्ली आया सबसे प्रमुख बात यह थी कि मराठों ने भी सैयद बंधुओं का का साथ दिया और छत्रपति मुगल सम्राट का नया बन गया निश्चय ही भारत का इतिहास सर्वथा भिन्न होता है यदि सैयद बंधु की प्रबुद्ध धार्मिक नीति का अनुसरण उनके उत्तराधिकारी भी करते रहते।

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