बंगाल विभाजन - कांग्रेस के ऊपर अगर किसी एक घटना ने सर्वाधिक प्रभाव डाला वह बंगाल विभाजन बंगाल प्रेसीडेंसी उस समय की सबसे बड़ी प्रेसीडेंसी थी जिसकी कुल संख्या 7.85 करोड़ थी । जिसमें उड़ीसा एवं बिहार के हिस्से भी शामिल थे । परंतु इस पूरे क्षेत्र में राजनीतिक चेतना इतनी बढ़ चुकी थी कि यह पूरे देश की आंदोलनकारी गतिविधियों का केंद्र बन गया था। बंगाल विभाजन एवं उससे संबंध स्वदेशी आंदोलन से जुड़े घटनाक्रम को समझना होगा-
बंगाल के विभाजन के समय वायसराय- लार्ड कर्जन
भारत सचिव- लॉर्ड रिजले
विभाजन प्रभावी -16 अक्टूबर 1905
दिसंबर 1930 ईस्वी में बंगाल विभाजन का प्रस्ताव की खबर फैलते ही चारों तरफ विरोध होने लगा। अधिकतर विरोधी बैठक ढाका, मेमन सिंह और चटगांव में हुआ। सुरेंद्रनाथ बनर्जी, कृष्ण कुमार मिश्र, पीसी राय जैसे नेताओं ने बंगाली, हितवादी संजीवनी जैसे अखबारों के द्वारा विभाजन के प्रस्ताव की आलोचना की।
तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड कर्जन ने प्रशासनिक असुविधा को बंगाल विभाजन का कारण बताया परंतु वास्तविक कारण राजनीतिक था । क्योंकि बंगाल उस समय भारतीय राष्ट्रीय चेतना का केंद्र बिंदु था और साथ ही बंगालियों में प्रबल राजनीतिक जागृति थी। जिसे कुचलने के लिए कर्जन ने बंगाल को बांटना चाहता । तत्कालीन गृह सचिव रिजले ने का कहना था। कि अविभाजित बंगाल एक बहुत बड़ी ताकत है और विभाजित हो जाने पर यह कमजोर हो जाएगा।
इस विभाजन का एक उद्देश्य हिंदू -मुस्लिम के बीच अविश्वास को बढ़ाना भी था कर्जन ने मुस्लिम को आश्वासन दिया कि इस विभाजन के द्वारा मुस्लिम उस एकता को पा सकेंगे जो सिर्फ खलीफाओं के समय में ही संभव हो सका था ।
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