2-बंगाल विभजन -

16 अक्टूबर 1905 को शोक दिवस के रूप में मनाया गया तथा रविंद्र नाथ टैगोर के सुझाव पर पूरे बंगाल में इस दिन को राखी दिवस के रूप में मनाया गया लोगों ने एक - दूसरे के साथ हाथ में राखियां बांध कर एकता जताई ।
स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव राष्ट्रव्यापी था। लोकमान्य तिलक व उनके पुत्र केतकर ने महाराष्ट्र विशेषकर मुंबई और पुणे में स्वदेशी आंदोलन का प्रचार किया स्वदेशी आंदोलन में संघर्ष की जितनी भी धाराएं प्रस्फटीत हुई उसमें सर्वाधिक सफलता विदेशी उत्पाद बहिष्कार आंदोलन को प्राप्त हुई । महिलाओं ने प्रथम बार बड़े पैमाने पर आंदोलन में भाग लेकर अपना योगदान दिया । उन्होंने स्वदेशी चूड़ियां पहनना व विदेश निर्मित बर्तनों का प्रयोग बंद कर दिया । कालीघाट के धोबियों ने विदेशी वस्त्रों को धोने से इंकार कर दिया, महंतों ने विदेशी चीनी से निर्मित प्रसाद को लेने से इंकार कर दिया , स्वदेशी आंदोलन ने जन जागरण के लिए स्वयंसेवी संगठन की भी मदद ली। इनमें से अधिक महत्वपूर्ण संगठन था स्वदेशी बांधव समिति बारीसाल से एक अध्यापक अश्विनी कुमार दत्त के नेतृत्व में स्वदेश बांध समिति 159 शाखाएं संपूर्ण बंगाल में स्थापित की गई थी । अश्विनी कुमार दत्त बहुसंख्यक मुसलमानों कृषक को आंदोलन के लिए प्रेरित किया।  स्वदेशी आंदोलन में अपने प्रचार हेतु पारंपरिक त्योहारों धार्मिक मेला, लोक परंपराओं ,लोक संगीत और लोक नाट्य का भी भरपूर उपयोग किया गया।  गणपति महोत्सव शिवाजी जयंती, रामदास महोत्सव के द्वारा लोकमान्य तिलक ने महाराष्ट्र में स्वदेशी आंदोलन को लोकप्रिय बनाने पर पुरजोर प्रयास किया। बंगाल में अरविंद घोष एवं बिपिन चंद्र पाल ने काली पूजा के माध्यम से स्वदेशी आंदोलन का प्रचार-प्रसार किया रविंद्र नाथ टैगोर ने आंदोलन को तेज करने के लिए प्रेरणास्रोत (आमार सोनार बांग्ला) बांग्लादेश का राष्ट्रीय गान नामक गीत और 'एकला चला रे' का नारा दिया। ग्रामीण हिंदू और मुसलमानों के बीच उस समय लोकप्रिय बंगला लोकसंगीत (पल्ली गिती और जारी गान) पर स्वदेशी आंदोलन की गहरी छाप पड़ी।

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