होमरूल लीग आंदोलन

प्रथम विश्व युद्ध से उत्पन्न परिस्थितियों की एक अन्य कम नाटकीय लेकिन अधिक प्रभावशाली प्रतिक्रिया हुई। एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक का होमरूल लीग आंदोलन बाल गंगाधर तिलक तथा एनीएनिबेसेन्ट दोनों की होम रूल लीग ने यह महसूस किया कि आंदोलन की सफलता के लिए उदारवादियों के नेतृत्व वाली कांग्रेस के साथ ही अतिवादी राष्ट्रवादीयों का भी समर्थन आवश्यक है। 1914 में नरमपंथियों एवं अतिवादियों के मध्य समझौते के प्रयासों के असफल हो जाने के पश्चात बाल गंगाधर तिलक एवं निवेश दोनों ने स्वयं के प्रयासों से राजनीतिक गतिविधियों को जीवंत करने का निश्चय किया। 1915 के प्रारंभ से एनी बेसेंट ने भारत एवं अन्य देशों में स्वशासन की स्थापना हेतु अभियान प्रारंभ कर दिया। उन्होंने जन सभाएं आयोजित की। तथा न्यू इंडिया एवं कॉमन विल नामक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया। इन पत्रों के माध्यम से उन्होंने अंग्रेज सरकार के सम्मुख भारत में सुशासन की स्थापना की मांग की। 1915 के वार्षिक कांग्रेस अधिवेशन में तिलक एवं एनिबेसेन्ट को अपने प्रयासों में थोड़ा सफलता मिली। इस अधिवेशन में यह निर्णय लिया गया कि उग्रवादियों को पुनः कांग्रेस में सम्मिलित किया जाएगा। यद्यपि एनीबेसेंट अपने इस प्रयास में सफल नहीं हो सकी थी। अधिवेशन में एनी बेसेंट अपनी योजना के लिए कांग्रेस का समर्थन प्राप्त करने में असफल रही। कांग्रेस शिक्षा के माध्यम से राजनीतिक मांगों का प्रचार प्रसार करने तथा स्थानीय कांग्रेस कमेटियों को पुनः सक्रिय करने का अवश्य सहमत हो गई। इसके पश्चात एनी बेसेंट ने कांग्रेस की स्वीकृति प्राप्त होने का इंतजार न करते हुए स्वयं के प्रयासों से होमरूल लीग के कार्यों को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया उन्होंने घोषित किया कि जो कि कांग्रेस ने उनके लिए को स्वीकृत प्रदान करने में अनिवार्य कदम नहीं उठाए हैं। फलतः लीग के माध्यम से वे अपने उद्देश्यों को स्वयं प्राप्त करने हेतु स्वतंत्र हैं। बाल गंगाधर तिलक तथा एनी बेसेंट ने किसी प्रकार के आपसी टकराव कोई संभावना को दूर करने के लिए पृथक पृथक लीग स्थापित करने का निर्णय लिया।
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