साइमन आयोग की घोषणा के समय भारत सचिव लॉर्ड बर्कन हेड द्वारा प्रस्तुत इस चुनौती कि भारतीय मिलकर संविधान की एक ऐसी रूपरेखा तैयार नहीं कर सकते हैं, जो सारे भारतीयों के एक मत से मान्य हो। इसका जवाब देने के लिए सभी महत्वपूर्ण भारतीय नेताओं और दलों ने परस्पर एकजुट होकर तथा संवैधानिक सुधारों की एक व्यक्ति योजना बनाते हुए 1928 में मुंबई में एम. ए .अंसारी की अध्यक्षता में एक सर्वदलीय सम्मेलन का आयोजन किया।जिसमें मोती लाल नेहरू की अध्यक्षता में भारतीय संविधान की रूपरेखा तैयार करने हेतु एक साथ सदस्य समिति का गठन किया गया।
यह 7 सदस्य थे- सर तेज बहादुर,सर अली इमाम, श्री एम.एस .अने ,सरदार मंगल सिंह , श्री शोएब कुरैशी, श्री जी.आर. प्रधान तथा श्री सुभाष चंद्र बोस। जवाहरलाल नेहरू को भी आमंत्रित सदस्य के रूप में शामिल किया गया। इन प्रमुख राजनीतिक कार्यकर्ताओं के द्वारा दर्जनों सम्मेलन और सारी बैठकें आयोजित की गई।
इस समय समिति के द्वारा भारत के संविधान की रूपरेखा से संबंधित अगस्त 1928 में अंतिम रूप से तैयार रिपोर्ट ही नेहरू रिपोर्ट के नाम से जाना गया। इसके मुख्य प्रावधान इस प्रकार थे -
- कनाडा व दक्षिण अफ्रीका की भांति भारत का दर्जा डोमिनियन स्टेट्स के समान हो।
- भारतीयों को 19 मौलिक अधिकार दिए जाने की बात की गई ।
- पृथक निर्वाचक मंडल का अधिकार समाप्त हो और इसके स्थान पर अल्पसंख्यकों के स्थानों के आरक्षण के सिद्धांत को स्वीकार किया जाए ।
- मताधिकार को 2% से बढ़ाकर 11% करने की भी बात की गई थी।
- सिंध और कर्नाटक अलग अलग प्रांत बनेंगे और भविष्य में प्रांतों का गठन भाषाई आधार पर हो।
- सिंध को मुंबई प्रांत से अलग किया जाएगा ।
- भारत में संघीय शासन की व्यवस्था हो जिसमें अवशिष्ट अधिकार केंद्र के पास रहे।
- भारत में संसदीय शासन की व्यवस्था हो जिसमें विधायिका कार्यपालिका के प्रति उत्तरदायी हो।
इस रिपोर्ट के प्रावधान निश्चित रूप से काफी महत्वपूर्ण और प्रासंगिक थे। इसलिए इसे स्वतंत्र भारत के संविधान का एक प्रारूप कह कर पुकारा गया परंतु मुस्लिम लीग और कांग्रेस के युवा वर्गों ने इसका प्रतिकार किया।