गांधी जी ने भारत की आजादी हेतु अहिंसात्मक आंदोलन के जिन तरीकों का प्रयोग किया, उसमें से एक सविनय अवज्ञा भी था। गांधीजी के अनुसार सविनय अवज्ञा का अर्थ है-" सरकार द्वारा बनाए गए उन कानूनों का विरोध करना जो नैतिक नहीं है।" उनका यह मानना था कि जनतंत्र में कुछ असाधारण परिस्थितियों में यदि नागरिक वैधानिक उपायो द्वारा आर्थिक कानून को रद्द ना कर सके, तो उसे सविनय पूर्वक उस कानून की अवज्ञा का अधिकार है।
गांधी जी ने 'सिविल डिसऑबेडिएंस' शब्द अमेरिका अराजकतावाद हेनरी डेविड थोरो से ग्रहण किया था। थोरों की तरह ही वे भी यह मानते थे, कि यदि एक दृढ़ नैतिक अल्पमत कोशिश करें तो बहुमत की बुराइयों को सुधारने की क्षमता रखता है। 1930 में गांधी जी के नेतृत्व में पूर्ण स्वराज की प्राप्ति हेतु जो आंदोलन चलाया गया, उस सविनय अवज्ञा या नागरिक अवज्ञा आंदोलन के नाम से जाना गया।
सविनय अवज्ञा आंदोलन के कारण :-
- साइमन कमीशन के बहिष्कार में भारतीय जनता ने जो उत्साह पूर्वक भागीदारी दिखाई, उसने यह प्रदर्शित किया कि भारत फिर से नए आंदोलन छेड़ने की स्थिति में है।
- स्वराज वादियो के आंदोलन के तरीकों ने भी भारतीयों में राष्ट्रीयता की भावनाओं को बनाए रखने में अपनी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- 1930 के दशक में श्रमिकों और किसानों में भी असंतोष की भावनाएं काफी बढ़ गई थी।
- इसी प्रकार भगत सिंह, चंद्रशेखर आदि के नेतृत्व में जिस क्रांतिकारी आंदोलन को संचालित किया गया था उसके परिणाम स्वरूप भारतीय राष्ट्रीयता अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच चुका था।
- इन्हीं परिस्थितियों में जब नेहरू रिपोर्ट के डोमिनियन स्टेट्स की मांग पर जब सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया, तो लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में 31 दिसंबर 1929 को जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पारित किया।
- 26 जनवरी 1930 को पहली पूर्ण स्वाधीनता दिवस मनाया और इसकी प्राप्ति हेतु सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाने का निर्णय लिया गया।