राष्ट्रवादी उपागम का विकास औपनिवेशिक उपागम से सामना करने और प्रत्युत्तर देने के रूप में हुआ। यह भारतीय लोगों और उनके इतिहासिक अभिलेख की औपनिवेशिक झूठी निंदा के सम्मुख राष्ट्रीय आत्मसम्मान के निर्माण का एक प्रयास था। इस उपागम के इतिहासकारों ने मौजूदा ऐतिहासिक स्रोतों के विश्लेषण के आधार पर औपनिवेशिक ऐतिहासिक विवरणओं की सत्यता को सिद्ध करने का प्रयास किया। भारतीय इतिहास के राष्ट्रवादी उपागम को ऐसे उपागम के रूप में विवेचन किया जा सकता है। जिसने राष्ट्रवादी भावनाओं को बढ़ाने में योगदान किया और धार्मिक, जाति, भाषाई या वर्ग भेदभाव के सम्मुख लोगों को एकजुट किया। राष्ट्रवादी उपागम मुख्य रूप से भारतीय इतिहास के प्राचीन एवं मध्यकालीन युग के बारे में वर्णन करता है। यह आधुनिक काल में मौजूद नहीं था और स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात अस्तित्व में आया। 1947 से पूर्व आधुनिक भारत के राष्ट्रवाद इतिहासकारों का कोई संप्रदाय मौजूदा नहीं था। दादा भाई नौरोजी, एमजी रानाडे, जीबी जोशी, आर सी दत्त, जी के गोखले जैसे गैर अकादमिक राष्ट्रवादी अर्थशास्त्रियों द्वारा 19वीं शताब्दी के अंत में उपनिवेशवाद की विस्तृत एवं वैज्ञानिक आलोचना विकसित की गई। राष्ट्रवादी उपागम ने सामाजिक सुधार आंदोलनों को उचित स्थान दिया। लेकिन उनका इस ओर आलोचनात्मक दृष्टिकोण नहीं रहा और उन्होंने अक्सर निम्न जाति और जनजातियों द्वारा चलाए गए मुक्ति आंदोलन की उपेक्षा की। उन्होंने ऐतिहासिक विकास में भारत की उत्कृष्टता को सिद्ध करने के प्रयास में भारतीय सामाजिक संस्थाओं के ऐतिहासिक मूल्यांकन की उपेक्षा कर दी। कुल मिलाकर इस उपागम ने आर्थिक सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास की उपेक्षा की।