3-बंगाल विभजन -

इस समय कला के क्षेत्र में अवनींद्र नाथ टैगोर ने भारतीय कला पर पाश्चात्य अधिपत्य को तोड़ा तथा मुगलों और राजपूतों की समृद्धि स्वदेशी पारंपरिक कला व अजंता की चित्रकला से प्रेरणा लेनी शुरू की 1906 में स्थापित इंडियन सोसाइटी ऑफ ओरिएंटल आर्ट (भारतीय प्राच्य कला संस्था) की पहली छात्रवृति भारतीय कला के मर्मज्ञ नंदलाल बोस को मिली। 
प्रसिद्ध वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय ने बंगाल केमिकल स्वदेशी स्टोर्स खोला । इसी प्रकार रविंद्र नाथ टैगोर में भी एक स्वदेशी भंडार खोलने में मदद की । पीसी राय और नील रत्न सरकार ने देसी उद्योग के विकास पर बल दिया । पी सी राय ने बंगाल केमिकल्स की स्थापना की बंगाल में राष्ट्रीय शिक्षा को फैलाने में सबसे बड़ा कार्य डॉन सोसायटी ने किया है । विद्यार्थियों का एक संगठन था ,जिसके सचिव सतीश चंद्र मुखर्जी थे , राष्ट्रीय शिक्षा को प्रचारित - प्रसारित करने के लिए उन्होंने डॉन नामक पत्र भी निकालना प्रारंभ किया ।
15 अगस्त 1906 को संत गुरुदास बनर्जी ने राष्ट्रीय शिक्षा परिषद का गठन किया इसका उद्देश्य था राष्ट्रीय नियंत्रण के अंतर्गत जनता को इस प्रकार का साहित्यिक, वैज्ञानिक ,तकनीकी शिक्षा देना जो राष्ट्रीय जीवन धारा से जुड़ी हो ।
1905 में कांग्रेस के बनारस अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए , गोपाल कृष्ण गोखले ने भी स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन को समर्थन प्रदान किया। गरमपंथी नेता तिलक ,बिपिन चंद्र पाल, लाला लाजपत राय एवं अरविंद घोष पूरे देश में इस आंदोलन को प्रचारित- प्रसारित करने के पक्ष में थे । 
1906 में कोलकाता कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए, दादाभाई नरोजी ने प्रथम बार कांग्रेस के मंच से स्वराज की मांग प्रस्तुत की । बहिष्कार एवं स्वदेशी आंदोलन ने विभाजन के विशाल जनमत तैयार किया , जिसके परिणाम स्वरूप लॉर्ड हार्डिंग ने 19 11 इसवी में बंगाल विभाजन को रद्द कर दिया ।
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