स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव

  1.  स्वदेशी आंदोलन के स्वरूप और उसके प्रसार क्षेत्र को लेकर कांग्रेस के भीतर तीव्र मतभेद उत्पन्न हो गए और 1960 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस का विभाजन नरमपंथी और गर्म पंथी जैसे दो दलों में हो गया।
  2. आंदोलन के एकाएक नेतृत्व विहीन होने और उसका दमन कर दिए जाने की वजह से इसमें शामिल युवा भारतीयों में भयंकर असंतोष उत्पन्न हुआ और तब उन्होंने उस समय के बदनाम ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या करने की राजनीति प्रारंभ कर दी और इस प्रकार क्रांतिकारी आंदोलन के प्रथम चरण की शुरुआत हुई। उल्लेखनीय है कि तिलक को 6 वर्ष की कैद की सजा देकर बर्मा की मांडले जेल में भेज दिया गया। वहां पर उन्होंने कैदी जीवन  के रूप में मराठी भाषा के अपने एक प्रसिद्ध ग्रंथ गीता रहस्य की रचना कर डाली। अपने जीवन काल में दो और प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की थी- द आर्कटिक होम आफ थे वेदास तथा औरायन। लाला लाजपत राय अमेरिका चले गए विपिन चंद्र पाल ने अस्थाई रूप से राजनीति से संन्यास ले लिया। जबकि अलीपुर षड्यंत्र केस से रिहा कर दिए जाने के बाद अरविंद घोष राजनीति से संन्यास लेकर दक्षिण भारत में एक फ्रांसीसी बस्ती पांडिचेरी चले गए वहीं पर ऑरोविले आश्रम की स्थापना की गई और वे एक महान दार्शनिक बन गए।
  3. स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव शिक्षा पर भी पड़ा 15 अगस्त 1986 को राष्ट्रीय शिक्षा परिषद की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय नियंत्रण के तहत ऐसी शिक्षा प्रदान करना था, जिससे भारत में राष्ट्र निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो सके। टैगोर की शांति निकेतन के तर्ज पर बंगाल नेशनल कॉलेज की स्थापना की गई। जिसके प्रथम प्रधानाचार्य अरविंदो घोष थे इस दौरान अनेक राष्ट्रीय विद्यालयों की स्थापना की गई। बंगाल में राष्ट्रीय शिक्षा फैलाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका 1902 में सतीश चंद्र मुखर्जी द्वारा स्थापित विद्यार्थियों की एक संगठन डॉन सोसाइटी ने अदा किया। इसके प्रमुख सदस्यों में कलकत्ता विश्वविद्यालय कि कुछ श्रेष्ठ विद्यार्थी शामिल थे। इसका उद्देश्य विश्वविद्यालय की शिक्षा की कमियों को पूरा करना एवं विशिष्ट जनों में उच्च संस्कार को विकसित करना था। इस आंदोलन के दौरान ब्रिटिश सरकार के द्वारा आंदोलन में शामिल विद्यार्थियों को हतोत्साहित करने के लिए 2 सर्कुलर जारी किए गए।
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