अंग्रेज प्रभुसत्ता को सबसे सुनियोजित तथा गंभीर चुनौती बहावी आंदोलन से मिली जो 19वीं शताब्दी के चौथे दशक से सातवें दशक तक चलता रहा। रायबरेली के सैयद अहमद इस आंदोलन के प्रवर्तक थे। वह अरब के अब्दुल वहाब से प्रभावित हुए पर अधिक प्रभाव दिल्ली के एक संत शाह वाली उल्लाह का था। सैयद अहमद इस्लाम में हुए सभी परिवर्तनों तथा सुधारों के विरुद्ध हजरत मोहम्मद के काल के इस्लाम धर्म को पुनः स्थापित करना चाहते थे। वास्तव में यह पुनुरूथान आंदोलन था।
इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए सैयद अहमद को एक उपयुक्त नेता, संगठन तथा स्थान की खोज थी जहां से अपना जिहाद आरंभ कर सकते उन्होंने अपने आपको इसका नेता बताया। अपनी अधीन चार उपनेता अथवा खलीफे नियुक्त किए और इस प्रकार एक देशव्यापी संगठन गठित किया जिस के संकेत गुप्त थे। उन्होंने उत्तर पश्चिमी कबायली प्रदेश में एक सिथाना अथवा इस्लाम का स्थान चुना जो समस्त आंदोलन का केंद्र था और इसके अतिरिक्त हैदराबाद में स्थापित की गई उनका उद्देश्य काफिरों के देश को मुसलमानों के देश दारुल इस्लाम में बदलना था उन्होंने पंजाब में सिक्खों के राज्य के विरुद्ध की घोषणा की उन्होंने 1830 में पेशावर जीत लिया परंतु छिन गया तथा सैयद अहमद युद्ध में मारा गया 1849 में जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने सिख राज्य को समाप्त कर दिया तो भारत के समस्त अंग्रेजी प्रदेश उनके क्रोध का निशाना बन गए 1857 के विद्रोह में वहाबियो ने अंग्रेज विरोधी भावनाओं के प्रसार में बहुत योगदान किया।