ऋगवैदिक काल में आर्य कई छोटे-छोटे कबीलों में विभक्त थे और ऋगवैदिक साहित्य के अनुसार कबीले को जन कहा जाता था और कबीले के सरदार को राजन कहा जाता था जो उसका होता शासक था
सबसे छोटी इकाई परिवार या कुल थी कई कुल मिलाकर ग्राम बनते थे जिसका प्रधान ग्रामणी होता है तथा कई ग्राम मिलाकर विश बनता था जिसका प्रधान विशपति होता था और कई विश मिलाकर जन का निर्माण करते था और जिस का प्रधान राजा होता था
ऋग्वेद में जन 275 बार तथा विश का 170 बार उल्लेख मिलता है जनपद शब्द का उल्लेख एक बार भी नहीं है राजा और प्रत्यय शब्द का उल्लेख एक बार हुआ है जबकि इंद्र शब्द का 250 बार प्रयोग हुआ है ऋग्वेद में देश या राज्य के लिए पहली बार राष्ट्र शब्द काम आया है किंतु यह प्रभुसत्ता संपन्न राज्य का सूचक नहीं है
सभा एवं समिति राजनीतिक संस्थाएं थी सभा यह वृद्व अभिजात लोगों की संस्था थी समिति यह सामान्य जनता की प्रतिनिधि सभा थी यह राजा पर नियंत्रण रखती थी समिति के सभापति को ईशान कहा जाता है
पूरप दुर्गपति होता था सप्श यह जनता की गतिविधियों को देखने वाले गुप्तचर होते थे ब्राजपति यह गोचर भूमि का अधिकारी होता था
परिवार पितृ सत्तात्मक था समाज में वर्ण-व्यवस्था कर्म पर आधारित थी और ऋग्वेद के दसवें मंडल के पुरुष सूक्त में चार वर्णों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र का उल्लेख है
सोम आर्यो का मुख्य पेय पदार्थों तथा यव (जौ) मुख्य खाद्य पदार्थ था समाज में स्त्रियों की स्थिति बहुत अच्छी थी इस समय समाज में विधवा विवाह, नियोग प्रथा तथा पुनर्विवाह का प्रचलन था लेकिन पर्दा प्रथा बाल विवाह और सती-प्रथा प्रचलित नहीं थी