÷उड़ीसा के मंदिर÷

उड़ीसा में आठवीं सदी से 13वीं सदी के मध्य तक बने मंदिर भारतीय आर्य वास्तुकला के आरंभिक रूप की झलक प्रस्तुत करते हैं। भुवनेश्वर में अनेक मंदिरों का निर्माण हुआ, जिससे इसे मंदिरों का शहर नाम दिया गया।  इनमें सबसे विलक्षण शिव को समर्पित लिंगराज मंदिर है। गर्भगृह के ऊपर बनी विशाल शिखर का परवालयिक वक्र इस शैली का विशिष्ट उदाहरण है। यह मंदिर 4 कक्षो की श्रंखला के रूप में- पूजा अर्चना, नृत्य, सभा और गर्भगृह के लिए बनाया गया है।

भुवनेश्वर में एक अपेक्षाकृत छोटा किंतु अत्यंत सुंदर मुक्तेश्वर मंदिर है। इसे प्रायः उड़ीसा की वास्तुकला  का रत्न कहा जाता है। इस मंदिर का महत्व केवल इसके सौंदर्य और वास्तुकला की सर्वांग संपूर्णता में ही नहीं है वरन यह उड़ीसा वास्तु कला के विकास क्रम में आरंभिक और परवर्ती निर्माण शैलियों का महत्वपूर्ण संंक्रमण बिंदु भी है।

पुरी के निकट स्थित कोणार्क मंदिर को ब्लैक पगोड़ा भी कहा जाता है। यह उत्तर भारत के विशाल हिंदू मंदिरों में सबसे प्रमुख और अंतिम है ।उड़िया मूर्तिकारों द्वारा वास्तुकला के विधानओं के साथ अलंकृत मूर्तिकला के सामंजस्य प्रयासों के भव्य और गौरवशाली चरमोत्कर्ष के रूप में देखा जा सकता है ।नरसिंह देव द्वारा बनवाया गया यह मंदिर सुसज्जित अश्वो द्वारा खींचे जाने वाले और विशाल पहियों वाले सूर्य देव के आकाश रथ की कल्पना पर आधारित है, मंच और प्रमुख के अग्रभाग उच्च चित्र व रियो से सुसज्जित है पृथ्वी पर जीवन की आनंद और सूर्य की ऊर्जा प्रदान शक्ति और को प्रतिबिंबित किया गया है कोणार्क में विश्व में प्रतिज्ञा मिथुन है।

पुरी का जगन्नाथ मंदिर तथा राजा रानी का मंदिर उड़िया वास्तु शैली के उत्कृष्ट नमूने है।

सामान्यतः उड़ीसा के मंदिरों में स्तंभ नहीं होता और उनकी छतों को आंशिक रूप से लोहे के गार्डरों पर टिकाया जाता था -यह एक महत्वपूर्ण तकनीकी नवीनता थी। इन मंदिरों का वाह्य भाग तो बड़ी भव्यता से सजाया गया है, लेकिन आंतरिक भाग को छोड़ दिया गया है (केवल मुक्तेश्वर मंदिर इसका अपवाद है।)

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