मराठा शक्ति का उदय

एक छोटी भूमि अस्त्र से उठकर बड़ी शासक के स्तर तक पहुंचने वाली मराठा शक्ति ने दक्कन की राजनीति को नया आयाम दिया। इससे ना केवल मुगल दक्कन संबंध प्रभावित हुए अपितु मुगलों की राजनीति भी प्रभावित हुई गौरतलब है कि अंग्रेजी कंपनी के भारत में क्षेत्रीय विस्तार में भी मराठा शक्ति एक निर्णायक तत्व बनी रही, अन्य राज्यों में सैनिकों पर कार्य करने वाले मराठा प्रशासन और सैन्य संगठनों की भी प्रस्तुति की। 18 वीं शताब्दी के मध्य तक वे लाहौर तक जा पहुंचे और उत्तर भारतीय साम्राज्य का स्वप्न देखने लगे मुगल दरबार में उन्होंने किंग मेकर की भूमिका निभाई ।पानीपत के तृतीय युद्ध में मराठा अहमद शाह अब्दाली के हाथों परास्त हुए जिस ने हालांकि सब कुछ बदल कर रख दिया फिर भी वह संगठित हुए अपनी शक्ति पुनरार्जित की और एक दशक के भीतर भारत में एक शक्ति के रूप में सामने आ गए बाजीराव प्रथम सभी पेशवाओं में सबसे महान शासक था जिन्हें तेजी से फैलती मराठा शक्ति को व्यवस्थित करने और कुछ हद तक सेनापति दाभोली नेतृत्व मराठों के क्षेत्रीय वर्ग को संतुष्ट करने के लिए महत्वपूर्ण मराठा सरदारों का संग शुरू किया मराठा परिवार जो मुख्य तौर पर उदित हुए बड़ौदा के गायकवाड़ ,नागपुर के भोसले, इंदौर के होलकर ,ग्वालियर की सिंधिया तथा पूना के पेशवा ।बाजीराव प्रथम के अंतर्गत राज्य संघ ने सौहार्दपूर्ण काम किया लेकिन पानीपत युद्ध सब कुछ बदल दिया पानीपत की हार और 1772 में युवा पेशवा माधवराव प्रथम ने राज्य संघ पर पेशवा उनके नियंत्रण को कमजोर कर दिया यदि किसी अवसर पर राज्य संघ की मुखिया एकत्रित होते थे जैसा कि ब्रिटिश शासकों के विरुद्ध अन्यथा वे प्रायःआपस में लड़ते रहते थे।
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