एफ बी टेलर ने महाद्वीपों तथा महासागरों के निर्माण की समस्या को सुलझाने के लिए एक नई विचारधारा महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत का प्रतिपादन सन 1908 में किया था, परंतु उसका प्रकाशन 1910 ईस्वी में हुआ था। टेलर की परिकल्पना का मुख्य उद्देश्य टर्शियरी युग के आधार पर मोड़दार पर्वतों की व्याख्या करना था। उन्होंने अपने इस सिद्धांत का शुभारंभ क्रीटेशस युग से किया है। उस समय मुख्यतः दो स्थल भाग लौरेंशिया, उत्तरी ध्रुव के पास, एवं गोंडवाना लैंड दक्षिणी ध्रुव के पास था। इनकी परिकल्पना के अनुसार महाद्वीप सियाल के और महासागर सीमा निर्मित है, और सियाल सीमा पर तैर रहे हैं। इन्होंने महा भूखंडों का प्रवाह विषुवत रेखा और पश्चिम की तरफ बताया। ज्ञातव्य है कि उन्होंने स्थल पर प्रवाह का मुख्य कारण ज्वारीय बल माना। उनके अनुसार उत्तरी ध्रुव प्रवाह से खिंचाव व विभंजन के फलस्वरुप बेफिन की खाड़ी, डेविस जलडमरूमध्य लेब्राडोर सागर और आर्कटिक सागर की रचना हुई। इसी तरह गोंडवाना लैंड के विषुवत रेखा की ओर प्रवाह से ग्रेट ऑस्ट्रेलिया वाइट तथा रास सागर का निर्माण हुआ। टेलर ने माना कि जहां भी प्रवाह के से अवरोध था, उसके अग्रभाग में पर्वतों तथा द्वितीय चाप का निर्माण हुआ। हिमालय काकेशस तथा आल्प्स पर्वत श्रेणियों का निर्माण कार्य तथा गोंडवाना लैंड के ध्रुवों की तरफ से विश्वत रेखा की ओर प्रवाहित होने से बना।