गांधीजी ने नेहरू को अपना उत्तराधिकारी क्यों चुना?

नेहरू एवं गांधी आधुनिकता धर्म ईश्वर राज्य एवं औद्योगीकरण के प्रति विचारों में भिन्न थे। नेहरू धर्म के प्रति उदासीन थे, जबकि गांधी जी ईश्वर में गहरी आस्था रखते थे। नेहरू जी का मानना था कि औद्योगिकरण ही भारत में व्याप्त अत्यधिक निर्धनता का एकमात्र समाधान है। जबकि गांधी जी ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था के पुनरुद्धार का आवाहन किया। नेहरू समाज सुधार एवं निर्धनता उन्मूलन में आधुनिक राज्य की शक्ति में विश्वास रखते थे, जबकि गांधी राज्य शक्ति को लेकर शंका में थे, और इसकी जगह व्यक्तियों एवं समुदायों की चेतना और इच्छाशक्ति में विश्वास करते थे। कई प्रकार की मत भिन्नता होने के बावजूद नेहरू गांधी जी का सम्मान करते थे, और गांधी अपने पुत्रों से अधिक नेहरू पर विश्वास करते थे। दोनों गुरु शिष्य में मूलभूत समानताएं थी। दोनो ही देश भक्तों को समावेशी और समग्र भाव में देखते थे। उन्होंने भारत को किसी विशेष जाति, भाषा, क्षेत्र या धर्म की अपेक्षा समग्र रूप से देखा ।दोनों ही अहिंसा और लोकतांत्रिक सरकार में विश्वास करते थे। राजमोहन गांधी ने अपनी पुस्तक द गुड बोटमैन में लिखा कि गांधी ने अपने विकल्प के तौर पर नेहरू को स्वीकार किया क्योंकि नेहरू जी ने विश्व से भारत के बहुलवादी एवं समावेशी स्वरूप किया, जिस पर महात्मा गांधी ने स्वयं बल दिया। अन्य विकल्प- सरदार पटेल, राजाजी, कृपलानी, राजेंद्र प्रसाद कुछ हद तक वर्गीय हितों एवं सहबद्धता के प्रति झुके हुए थे, लेकिन नेहरू एक ऐसे हिंदू थे जिन पर मुसलमान भरोसा कर सकते थे। एक ऐसे उत्तर भारतीय व्यक्ति थे जिनका दक्षिण भारत में सम्मान होता था, और एक ऐसे पुरुष थे महिलाएं जिन की प्रशंसा किया करती थी। गांधी की तरह सच्चे अर्थों में नेहरू सचमुच में एक अखिल भारतीय नेता थे, और उन्हें उत्तराधिकारी बनाने का बड़ा कारण यह भी था कि उन्होंने भारतीयों को आशान्वित किया कि हम एक बेहद समृद्ध एवं शांतिपूर्ण समाज का निर्माण कर सकते हैं।
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