रस, भाग - 2

  • शृंगार रस को रसराज या रस पति भी कहा जाता है।
  • सर्वप्रथम आचार्य भरतमुनि ने अपने ग्रंथ नाट्यशास्त्र में रसों का विवेचन किया था इसीलिए इन्हें रस संप्रदाय का प्रवर्तक माना जाता है।
  • इस प्रकार नाटक में 8 ही रस माने जाते हैं क्योंकि वहां शांत रस को किसी भी रस की संज्ञा नहीं दी गई है।
  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने संस्कृत के रसवादी आचार्य की तरह रस को आलौकिक ना मानकर लौकिक माना है और इसकी अलौकिक व्याख्या की है वह रस को हृदय की मुक्त अवस्था के रूप में मानते हैं।
  • श्रृंगार रस का स्थाई भाव रति/प्रेम , हास्य रस का स्थाई भाव हास, करुण रस का स्थाई भाव शोक, वीर रस का स्थाई भाव उत्साह,  रौद्र रस का स्थाई भाव क्रोध, भयानक रस का स्थाई भाव भय, वीभत्स रस का स्थाई भाव जुगुप्सा/घृणा, अद्भुत रस का स्थाई भाव विस्मय/आश्चर्य, शांत रस का स्थाई भाव शम/निर्वेद, वत्सल रस का स्थाई भाव वात्सल्य रति और भक्ति रस का स्थाई भाव भगवत विषयक रति/ अनुराग है।
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