बक्सर का युद्ध तथा उसका महत्व

 कंपनी तथा नवाब में युद्ध 1763 में ही आरंभ हो गया कई झड़पे हुई तथा मीर कासिम ने हार खाई। बचकर वह अवध पहुंचा तथा अवध के नवाब तथा मुगल सम्राट से मिलकर अंग्रेजों को बंगाल से बाहर निकालने की योजना बनाई। इन तीनों की सम्मिलित सेना जिसमें 40 तथा 50000 के बीच सैनिक थे, की टक्कर कंपनी की सेना से हुई। कंपनी की सेना में 7027 सैनिक थे तथा उसकी कमान मेजर मंनरो के हाथ में थी युद्ध बक्सर के स्थान पर 22 अक्टूबर 1764 को हुआ। दोनों दलों की क्षति अत्यधिक हुई परंतु मैदान अंग्रेजों के हाथ रहा।

युद्ध घमासान हुआ। अंग्रेजों के 847 सैनिक घायल हुए अथवा मारे गए दूसरी ओर 2000 के लगभग तथा मारे गये। प्लासी का युद्ध , युद्ध-कौशल से नहीं जीता गया था। वहां विश्वासघात हुआ था, परंतु यहां दोनों ओर से डट कर युद्ध किया गया। तैयारी पूरी थी। निश्चय ही यह कुशल सेना की जीत थी।

बक्सर ने प्लासी के निर्णयों पर पक्की मुहर लगा दी। भारत में अब अंग्रेज को चुनौती देने वाला कोई दूसरा नहीं रह गया था। अब नया नवाब उसकी कठपुतली था।अवध का नवाब उनका आभारी प्रथम मुगल सम्राट उनका पेंशनर था। इलाहाबाद तक का प्रदेश अंग्रेजों के चरणों में आ गया तथा दिल्ली का मार्ग खुला था। इसके पश्चात बंगाल तथा अवध ने अंग्रेजोंं के अधिकार से बाहर आने का प्रयत्न नही  तथा उनका फंदा और भी सुदृढ़ होता चला गया।

प्लासी की युद्ध ने बंगाल में अंग्रेजों की शक्ति को सुदृढ़ किया तथा बक्सर के युद्ध ने उत्तरी भारत में तथा अन्य समस्त भारत में, तथा अब वेे समस्त भारत पर दावा करने लगे थे इसके पश्चात मराठों तथा मैसूर ने कुछ चुनौती देने का प्रयत्न किया। परंतु भारत की दास्तां अब स्पष्ट थी ,केवल समय का प्रश्न था। बक्सर का युद्ध भारतीय इतिहास में निर्णायक सिद्ध हुआ।

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