1857 की महान विद्रोह का एक सबसे बड़ा रिक्त यह था कि सरकार की यह धारणा बन गई कि 1857-58 के षड्यंत्र के लिए मुसलमान ही उत्तरदाई है और वे अत्यंत षड्यंत्रकारी लोग हैं 1860-1870 के आस-पास हुए बहावी षडयंत्र ने यह धारणा और दृढ़ कर दी फिर 1870 के उपरांत डब्लू डब्लू हंटर की इंडियन मुसलमान की पुस्तक में सुझाव दिया गया कि मुसलमानों से समझौता करना चाहिए ,और निश्चित रियासत द्वारा अंग्रेजी सरकार की ओर आना चाहिए मुसलमानों के एक नेता सैयद अहमद खान थे, सरकार के संरक्षण को स्वीकार करने को उद्धत था। मुसलमानों ने यह अनुभव किया कि यदि मुसलमान अपने आप को अलग-अलग रखेंगे तो वे प्रशासन में अपने अधिकारों से वंचित रह जाएंगे 19वीं शताब्दी की मुस्लिम सुधार को में सर सैयद अहमद खान का नाम विशेष महत्व रखता है उन्होंने 1817 में दिल्ली केवमुस्लिम घरआने में जन्म लिया और फिर परंपरागत मुस्लिम से विद्या प्राप्त की। 1857 के विद्रोह के समय वह कम्पनी की न्यायिक सेवा में थे। पूर्ण भक्त रहे उन्होंने मुसलमानों की मुसलमानों और उसके अधीन सेवा करना आरंभ कर दी। बहुत सफल रहे उन्होंने इस्लाम में सामाजिक कुरीतियों को दूर करने का प्रयत्न किया। दास प्रथा को इस्लाम के विरुद्ध बतलाया और अपने विचारों का पत्रिका तहजीब उल अखलाक द्वारा किया सबसे महत्वपूर्ण थी जिसमें उन्होंने परंपरागत टीका कारों की आलोचना की और समकालीन वैज्ञानिक ज्ञान के प्रकाश में अपने विचार व्यक्त किए उन्होंने कुरान के अध्ययन पर बल दिया और कहा कि ईश्वरीय ज्ञान की व्याख्या ईश्वरीय कार्य द्वारा जो सबके सम्मुख है ही होनी चाहिए। उन्होंने 1875 में एक मुस्लिम एंग्लो ओरिएंटल स्कूल आरंभ किया जहा पाश्चत्य विषय, विज्ञान और मुस्लिम धर्म दोनों ही पढाये जाते थे। शीघ्र ही अलीगढ़ मुस्लिम संप्रदाय के धार्मिक तथा सांस्कृतिक पुनर्जागरण का केंद्र बन गया।यही पौधा आगे चलकर 1920 में अलीगढ़ विश्वविद्यालय के वृक्ष के रूप में सामने आया।