9 दिसंबर 1946 को आयोजित संविधान सभा की प्रथम बैठक में मुस्लिम लीग सम्मिलित नहीं हुई। तत्पश्चात लिंग की अनुपस्थिति में बैठक में जवाहरलाल नेहरू द्वारा तैयार किए गए एक मसौदे को पारित किया गया। जिसमें एक स्वतंत्र पूर्व प्रभुतासंपन्न गणराज्य की स्थापना का आदर्श लक्ष्य था, जिसे स्वायत्तता अल्पसंख्यकों को पर्याप्त संरक्षण देने का अधिकार तथा सामाजिक राजनीतिक एवं आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त होगी। मुस्लिम लीग ने मंत्रिमंडल द्वारा निर्णय लिए जाने के लिए आहूत की गई अनौपचारिक बैठक में भी भाग नहीं लिया। मुस्लिम लीग ने कांग्रेस के सदस्यों द्वारा लिए गए निर्णय तथा नियुक्तियों पर सवाल उठाए। वित्त मंत्री के रूप में लियाकत अली खान मंत्रिमंडल के मंत्रियों के कार्य में बाधक बन रहे थे। मुस्लिम लीग का उद्देश्य किसी भी तरह पाकिस्तान का निर्माण करना था, तथा उसकी समस्त गतिविधियां तथा निर्णय इसी भावना से ओतप्रोत थी। उसके लिए यह गृह युद्ध जैसी प्रक्रिया थी। दूसरी ओर कांग्रेस ने सरकार से मांग की कि वह या तो मुस्लिम लीग को अंतरिम सरकार को सहयोग देने के लिए कहे या सरकार से अलग होने को कहे। फरवरी 1947 में मंत्रिमंडल के सदस्यों ने वायसराय को पत्र लिखकर मांग की कि वे लीग के सदस्यों को त्यागपत्र देने के लिए कहे अन्यथा वे मंत्रिमंडल से अपना नामांकन वापस ले लेंगे। तत्पश्चात द्वारा संविधान सभा को भंग करने की मांग से स्थिति और बिगड़ गई। इस प्रकार गतिरोध सुलझने के स्थान पर और बढ़ता हुआ प्रतीत होने लगा।