प्रश्न -: 18 वीं शताब्दी में भारत को "अरब सागर की रानी" क्यों कहा जाता था?
उत्तर-: मुगल काल के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक अर्थव्यवस्था का लगभग एक चौथाई थी। अनेक यूरोपियन कंपनियां मोटे लाभ के लिए भारत में अपनी जगह बनाने में व्यस्त एवं संघर्षशील थी। भारतीय समुद्री यूरोपियन शक्तियों के लिए राजनैतिक एवं व्यापारिक अखाड़ा बन चुका था। भारत के साथ व्यापार में होने वाले असीमित लाभ का आकलन एक छोटे से उदाहरण से किया जा सकता है कि मात्र पुर्तगाली नाविक वास्कोडिगामा के जहाज में ले जाए गए सामान को बाजार में बेचने पर उसके कुल अभियान पर आए खर्च का 60 गुना लाभ प्राप्त हुआ था। भारतीय मसालों विशेषकर काली मिर्च की यूरोप में भारी मांग थी। काली मिर्च का प्रयोग प्राचीन मिस्र में "ममी" पर लेप चढ़ाने में किया जाता था। 18 वीं शताब्दी के यूरोप में भी काली मिर्च का दर्जा एक विलासिता की वस्तु के समान था, इसका प्रयोग दवाइयों /एफ्रोडिजिएक के रूप में किया जाता था। मसालों के व्यापार में होने वाले असामान्य लाभ के अतिरिक्त सूती कपड़े, रेशम, नील , शिरा, अफीम रत्न इत्यादि भी यूरोपीय कंपनियों के लिए आकर्षण के बड़े स्त्रोत थे। एक बड़ा निर्यातक देश होने के साथ-साथ भारत विश्व का सबसे बड़ा बाजार भी था जहां यूरोपीय देशों के लिए भी अपनी वस्तुओं के निर्यात के बड़े अवसर उपलब्ध थे। 1760 में यूरोप में हुई औद्योगिक ने भारत के महत्व को और अधिक बढ़ा दिया था क्योंकि भारत में ही यूरोपियन कंपनियों के दोनों आवश्यक पहलुओं 'कच्चा माल की सस्ती एवं आसान उपलब्धता तथा तैयार माल की खपत' की पूर्ण करने की क्षमता थी। इस कारण शीघ्र ही यूरोपीय व्यापारिक जहाज हिंद महासागर में नजर आने लगे थे। यूरोपीय कंपनियों ने अपने व्यापारिक हितों के लिए साम-दाम-दंड-भेद सभी तरीकों का प्रयोग किया तथा अपने उद्देश्य में पूर्ण रूप से सफल भी रहे, विशेष रूप से अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी।
पुर्तगालियों द्वारा भारत के लिए खोजा गया समुद्री रास्ता शीघ्र ही यूरोपीय देशों के लिए खजाने की चाबी बन गया। यूरोपीय कंपनियों के लिए भारत के बढ़ते व्यापारिक महत्व भारत के लिए "अरब सागर की रानी" से प्रभावी उपनाम का प्रयोग आरंभ कराया।