राजपूत कालीन प्रशासन

राजपूत काल में राजा शासन का सर्वे सर्वा होता था। राजा का पद वंश परंपरागत होता था। कानून न्याय और शासन तीनों ही दृष्टि से राज्य श्रेष्ठ होता था। राजा को परामर्श देने के लिए एक मंत्रिमंडल होता था। मंत्री अपने-अपने विभागों का प्रबंध करते थे। प्रत्येक राज्य में एक पुरोहित भी होता था, जिसका पद मंत्री के समान होता था। अनेक उच्च श्रेणी के अधिकारी भी होते थे-जैसे प्रतिहार, सेनाधिपति, आक्षपाठलिक, भिषक, नैमित्तिक और कृत। यह सब अधिकारी राजधानी में रहते थे और राजा के साथ इनका सीधा संबंध था। राज्य प्रांतों में विभक्त होता था। प्रायः युवराज या राजघराने के व्यक्तियों को ही प्रांत में शासक बनाया जाता था। प्रांत विभागों में विभक्त होता था। प्रत्येक विभाग का एक अधिकारी होता था तथा उसके अधीन बहुत से कर्मचारी होते थे। विभाग का अधिकारी मालगुजारी एकत्र करने न्याय करने और शांति व्यवस्था बनाए रखने का कार्य करता था। कोतवाल जैसा एक पुलिस अधिकारी प्रत्येक विभाग या जिले में रहता था। ग्राम शासन की सबसे छोटी इकाई थी। ग्राम का प्रबंध ग्राम सभाओं के हाथ में था। प्रत्येक ग्राम की एक सभा होती थी, जो अपने क्षेत्र में शासन कार्य संभालती थी। स्थान और काल भेद से ग्राम सभाओं के संगठन भिन्न भिन्न थे। ग्राम सभा के अधिवेशन की अध्यक्षता ग्रामणी नामक कर्मचारी करता था। शासन की सुविधा हेतु अनेक समितियों का निर्माण किया जाता था ,तथा उन्हें विविध प्रकार के कार्य सौपे जाते थे। क्षेत्र के झगड़े निपटाना, बाजार का प्रबंध करना, कर वसूल करना, खेतों, चरागाहों आदि की देखभाल करना आदि कार्य ग्राम सभाओ के कार्य क्षेत्र में दिए गए थे। शत्रुओं और डाकुओं से गांव की रक्षा करना ग्राम संस्थाओं का कार्य था। ग्राम संस्था ग्राम क्षेत्र से राज्य के लिए वसूल किए जाने वाले करो को एकत्र करने के लिए भी उत्तरदाई थी ।नगर का प्रबंध करने के लिए पट्टनाअधिकारी नामक अधिकारी होता था।यह अधिकारी वह सभी कार्य करता था, जो आजकल नगर पालिका के कार्य पालिका अधिकारी करते हैं।
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