सामाजिक प्रगति में इंटरनेट की सहभागिता में अफ़वाह का तंत्र part २

हमारे देश में सोशल मीडिया के सभी सकारात्मक पहलुओं के बावजूद यहाँ झूठ, ईर्ष्या और आत्म-प्रचार का एक ऐसा माहौल बना है, जिससे इसकी उपयोगिता पर नए सवाल उठ रहे हैं।

  • अगर मुख्यधारा मीडिया में सत्ता और पूंजी के गठजोड़ से इसकी तटस्थता प्रभावित होती रही है, तो सोशल मीडिया पर एक तरफ तो कुछ भोले-भाले लोग हैं, जो अपनी गतिविधियों को लेकर सक्रिय हैं, तो दूसरी तरफ एक शातिर तबका है, जिसका अपना सुनियोजित एजेंडा है।

  • अगर कोई व्यक्ति, प्रतिष्ठान या समूह में अपनी बात सार्वजनिक करने के लिए प्रेस-वार्ता के बजाय ट्वीट करके काम चला रहा है, तो प्रचार की इस सहजता का लाभ अफवाह फैलाने वालों के भी काम आ रहा है।

  • देश में अनेक सांप्रदायिक दंगों का आधार ऐसी कुछ अफवाहें रही हैं।

  • इसमें हालिया शिलांग में सद्भाव बिगाड़ने का कुत्सित प्रयास भी रहा है।

  • इस पूरे प्रकरण में दुर्भाग्य यह है कि तथ्य से परे जाकर संपादित तस्वीरें, ऑडियो या वीडियो जैसे संचार के प्रभावी माध्यमों को प्रसारित करने में पढ़े-लिखे लोगों का संरक्षण मिलता है, जिसका बड़ा कारण यह है कि यह झूठी सामग्री उनके एजेंडे या उद्देश्यों के अनुकूल होती है, जबकि समाज के जिम्मेदार नागरिक की भूमिका में इनको झूठ के प्रसार को हर संभव रोकना चाहिए।

  • दूसरी तरफ एक ऐसा प्रचलन भी तेजी से विकसित हुआ है, जिसको न तो अपनी सार्वजनिक उपस्थिति की दशा में अपेक्षित मर्यादा की चिंता है और न समझदारी है।

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