भुमी सुधिर का आकलन

» जो भू-स्वामी राजनीतिक रूप से प्रभावशाली थे, वे इन सुधारों के प्रयोजन को नष्ट करने में कामयाब रहे। तथापि, जैसा कि पी.एस. अप्पू ने 1996 की अपनी चर्चित पुस्तक लैंड रिफॉर्म्स इन इंडिया में लिखा है,1992 तक महज 4 प्रतिशत ज़मीन के जोतदारों को स्वामित्व का अधिकार मिल पाया था। इन जोतदारों में से भी 97 प्रतिशत सिर्फ सात राज्यों-असम, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के थे।

» स्वामित्व का अधिकार जोतदार को हस्तांतरित करने की कोशिश करने पर, कई राज्यों ने काश्तकारी को ही समाप्त कर दिया। लेकिन भूमि हस्तांतरण भले न्यूनतम हो पाया हो, किंतु इस नीति का एक परोक्ष परिणाम यह अवश्य हुआ कि जहां कहीं भी काश्तकारी किसी रूप में बची थी,उसको संरक्षण दिया जाना समाप्त हो गया और भविष्य में काश्तकारी की गुंजाइश ख़त्म हो गई। कई राज्यों ने काश्तकारी की अनुमति तो दी, लेकिन यह शर्त लगाई कि भूमि किराया उत्पाद के एक-चौथाई से पांचवे हिस्से तक के बराबर होगा। किंतु चूंकि यह दर बाज़ार-दर से काफी कम थी, इसलिए इन राज्यों में भी ठेका ज़बानी तौर पर चलता रहा जिसके लिए काश्तकार उत्पाद का लगभग 50 प्रतिशत बतौर किराया देता था।

» इन विभिन्न सुधारों का मौजूदा प्रभावशाली आकलन मिलाजुला रहा है। 1949 तक भूमि सुधार राज्य का विषय था हांलाकि इसे विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से केंद्र द्वारा आगे बढ़ाया गया। अधिनियमन और कार्यान्वयन राज्य सरकारों की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर था। जमींदारों के कथित दमनकारी चरित्र और अंग्रेजों के साथ उसके करीबी गठबंधन को समाप्त करने तथा बिचौलियों के वर्चस्व को व्यापक राजनीतिक समर्थन ने ही इन सुधारों के कार्यान्वयन के लिए प्रेरित किया और इनमें से अधिकांश 1960 के दशक में पूरे कर लिए गए। काश्तकारी सुधारों के मुद्दे पर केंद्र और राज्य के अधिकारों को बहुत कम स्पष्ट किया गया था। कई राज्य विधायिकाओं पर जमींदारों का नियंत्रण था और इन सुधारों से इस वर्ग को नुकसान हुआ था। हालांकि भूमि सुधार कानूनों के कार्यान्वयन में काश्तकारों को पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व की अच्छी सफलता मिली थी।

» अधिनियम के पर्याप्त प्रचार होने के बावजूद भी, भूमि हदबंदी के मामलों में इसे लागू करने के लिए राजनीतिक विफलता जिम्मेदार रही। अधिशेष भूमि को जब्त करने से बचाने के लिए जमीन मालिकों ने अपनी जमीनों को अपने संबंधियों, दोस्तों और आश्रितों को हस्तांतरित कर दी थीं । भूमि समेकन कानून को अन्य सुधारों की तुलना में कम अधिनियमित किया गया था और आंशिक रूप से भूमि रिकार्ड की कमी के कारण इसका कार्यान्वयन कुछ राज्यों को ही प्रभावित कर पाया था। गांव स्तर के अध्ययन में भी विभिन्न भूमि सुधारों द्वारा गरीबी पर पड़े प्रभाव का एक बहुत ही मिश्रित मूल्यांकन किया गया है।












 
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