1948 की औद्योगिक नीति

इस नीति में मिश्रित अर्थव्यवस्था के अंतर्गत आगामी वर्षों में राज्य द्वारा अपने नियंत्रण अधीन नवीन उत्पादक इकाइयों की स्थापना की घोषणा की गई। निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्र को संयुक्त रूप से कार्य करना था। निजी क्षेत्र को देश की सामान्य औद्योगिक नीति के अंतर्गत अपनी गतिविधियां संचालित करनी थी। ऊर्जा, शस्त्र, अस्त्र, रेलवे, मुद्रा उत्पादन आदि क्षेत्रों में राज्य के अधीन सार्वजनिक क्षेत्र की परिकल्पना की गई। विमान एवं पोत निर्माण, लोहा, कोयला, खनिज तेल तथा संचार क्षेत्र में राज्य द्वारा आधारभूत उद्योगों की स्थापना करने का निश्चय किया गया। सार्वजनिक क्षेत्र को सामाजिक परिवर्तन के साधन के रूप में मान्यता दी गई। इसमें लघु एवं कुटीर उद्योगों को राज्य द्वारा प्रोत्साहन देने का प्रस्ताव था। उद्योगों हेतु विशिष्ट वस्तुओं के उत्पादन को आरक्षित किया गया। पिछड़े क्षेत्रों में उद्योगों की स्थापना द्वारा क्षेत्रीय असंतुलन दूर करना भी राज्य का दायित्व माना गया। इस प्रकार 1948 की औद्योगिक नीति द्वारा संविधान के नीति निर्देशक तत्व को लागू करने का प्रयास किया गया।
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