इस नीति के प्रस्ताव में उद्योगों को तीन वर्गों में विभाजित किया गया। पहले वर्ग, में शस्त्र अस्त्र उत्पादन, परमाणु ऊर्जा, भारी उपकरण, लौह इस्पात, कोयला, खनिज तेल, धातु उद्योग भारी विद्युत उपकरण, अन्य महत्वपूर्ण खनिज, वायु परिवहन, रेलवे, वैमानिकी, टेलीफोन विद्युत उत्पादन व वितरण तथा तार एवं रेडियो उपकरण जैसे 17 उद्योगों को रखा गया। यह राज्य के पूर्ण नियंत्रण में थे। दूसरे वर्ग, में अन्य अलौह धातु व एलुमिनियम, अन्य खनिज उद्योग, लौह मिश्र धातु एवं औज़ारी इस्पात, प्रतिजैविक व अन्य औषधि रसायन उद्योग, उर्वरक, संश्लेषित रबर, सड़क परिवहन व समुद्री परिवहन, कोयले का कार्बनीकरण तथा रासायनिक अपशिष्ट जैसे 12 उद्योगों को शामिल किया गया। इन उद्योगों में राज्य का नियंत्रण बढ़ता जाना था तथा राज्य इनमे नवीन उद्यमों की स्थापना करेगा। निजी क्षेत्र से इन उद्योगों के संचालन में की सहायता करने की अपेक्षा की गई। शेष सभी उद्योग निजी क्षेत्र के हाथों में सौंप दिए गए। किन्तु इस वर्ग के उद्योगों को भी सामाजिक उद्देश्यों एवं नियंत्रण विधानों के अधीन कार्य करना था। इस औद्योगिक नीति स्पष्ट किया गया कि निजी क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्र आपस में परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं। निजी क्षेत्र की आशंका का समाधान करने के लिए राज्य द्वारा पूंजी समर्थन राजकोषीय उपायों सुविधाओं के माध्यम से निजी क्षेत्र के विकास को पर्याप्त समर्थन दिया गया।इस नीति में राज्य के सरकारी व निजी दोनों इकाइयों के प्रति न्याय पूर्ण एवं भेदभाव रहित व्यवहार को सुनिश्चित किया गया। इसमें लघु एवं कुटीर उद्योग प्रादेशिक असमानता की समाप्ति तथा श्रमिक सुविधाओं के विस्तार की सिफारिश भी की गई, जिन्हें पूरा करना राज्य के नियंत्रण के बगैर असंभव था।