भारतीय संविधान Easy Notes - 02 (1600 - 1765 ई. (अंग्रेजो का भारत आगमन) )

क्रमशः..

Day – 02

1600 – 1765 ई. (अंग्रेजो का भारत आगमन)

  • भारत का संवैधानिक इतिहास ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना के साथ प्रारम्भ होता है जब इंग्लैण्ड में महारानी एलिजाबेथ प्रथम का शासन था। इतिहास में इस शासन को ‘स्वर्ण काल’ कहा जाता है। यह कार्य एक चार्टर (राजलेख) के माध्यम से किया गया, जिसे सन् 1600 ई. का चार्टर कहा जाता है।
  • प्रारम्भ में इस कम्पनी का एकमात्र लक्ष्य भारत के साथ व्यापार करना था किन्तु बाद मे धीरे – धीरे कम्पनी ने यहाँ का शासन अपने हाथ में ले लिया।
  • कम्पनी ने अपना कार्य सूरत से प्रारम्भ किया लेकिन धीरे – धीरे उसने सम्पूर्ण भारत को अपना कार्य – क्षेत्र बना लिया। बम्बई, कलकत्ता और मद्रास में बड़े – बड़े व्यापारिक केंद्र स्थापित किये गये।

      1600 ई. का राजपत्र (चार्टर)

  • इस राजपत्र को ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने 31 दिसम्बर, 1600 ई. को जारी किया था। राजपत्र का उद्देश्य अंग्रेज व्यापारियों की उस टोली को वैधानिक सुविधायें प्रदान करना था जिसने पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने की इच्छा प्रकट की थी।
  • इस राजपत्र ने एक व्यापारिक कम्पनी स्थापित की तथा राजपत्र में दी गई राजकिय उपाधि के अनुसार व्यापारियों की इस टोली का नाम दि गवर्नर एण्ड कम्पनी ऑफ मर्चेण्ट्स ट्रेडिंग इन टू दि ईस्ट इण्डिजरखा गया।
  • इस राजपत्र में कम्पनी को व्यापार करने के लिए 15 वर्ष की अवधि प्रदान की गई थी। ब्रिटिश क्राउन के पास यह अधिकार आरक्षित था कि 15 वर्ष की अवधि के बीच में ही किसी समय, इसे उस परिस्थिति में समाप्त कर सकते है जबकि कम्पनी का व्यापार ब्रिटेन के लिये हानिकारक साबित हो या ऐसा होने का आशंका उत्पन्न हो। किन्तु अवधि को बीच में समाप्त करने से पूर्व कम्पनी को 2 साल की नोटिस देना आवाश्यक था। यदि कम्पनी का व्यापार ब्रिटिश राष्ट्र के लिए लाभप्रद साबित होगा तथा कम्पनी ने अवधि बढ़ाने की प्रार्थना की तो ब्रिटिश क्राउन अवधि को 15 वर्ष के लिये और बढ़ा सकता था।
  • राजपत्र ने इस कम्पनी को ‘केप ऑफ गुडहोप’ से लेकर पूर्व की तरफ मैगलन की खाड़ी, भारत, एशिया, अफ्रीका, अमरीका आदि विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र में व्यापार करने का एकाधिकार प्रदान किया। अन्य किसी भी ब्रिटिश प्रजा को बिना कम्पनी या ब्रिटिश क्राउन की पूर्व अनुमति के इस क्षेत्र में व्यापार करने से मना कर दिया गया था, जिसका उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को जुर्माना, कारावास, जहाज व माल का अपहरण या ऐसी अन्य सजाओं जिसे ब्रिटिश क्राउन न्यायोचित तथा सुविधाजनक समझे दे सकते थे।
  • कम्पनी का संचालन लोकतांत्रिक विधि से करने का निर्देश था। कम्पनी के सारे शेयर होल्डर्स सम्मिलित रुप से ‘आम सभा’ का निर्माण करते थे। आम सभा प्रत्येक वर्ष अपने बीच के सदस्यों में से 24 व्यक्तियों की संचालन समिति (कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स) का चुनाव करती थी। संचालन समिति के ऊपर गवर्नर की नियुक्ति की गई थी।
  • कम्पनी को विधिक व्यक्तित्व का दर्जा प्रदान किया गया तथा उसे यह अधिकार दिया गया था कि वह मुकदमे व अन्य कार्यवाहियाँ अपने नाम से ही दायर कर सकते हैं। कम्पनी को निगम घोषित किया गया था।
  • व्यापारियों की इस कम्पनी को साधारण कानून बनाने का अधिकार दिया गया। भारत के विधि – इतिहास की पृष्टभूमि में यह पहला अवसर था जब किसी अराजकीय संस्था को कानून – निर्माण का अधिकार दिया गया था।
  • कम्पनी को कत्ल, राजद्रोह, डकैती आदि गम्भीर अपराधों के मामलों के लिए कानून बनाने का कोई अधिकार नहीं था। कम्पनी को अंग्रेजी व्यवस्था के मौलिक सिध्दांतो में भी परिवर्तन लाने का कोई अधिकार नहीं था।
  • कम्पनी की लागत पूँजी 75,373 पौण्ड थी जिसमें 39,771 पौण्ड जहाजों में लगी थी, 6,80 पौण्ड का सामान लदा था तथा 28,742 पौण्ड अन्य फुटकर मदों में प्रयुक्त की गई थी।
  • कम्पनी से सर्वप्रथम 1612 ई. में सूरत में अपनी पहली व्यापारिक कोठी स्थापित की जिसकी अनुमति उन्हें स्थानीय मुगल गवर्नर ने दी थी। कालान्तर में कम्पनी ने बम्बई, मद्रास तथा कलकत्ता में अपने व्यापारिक केंद्र स्थापित किये तथा इन नगरों को ‘प्रेसीडेन्सी नगर’ कहा गया।
  • प्रेसीडेन्सी नगरों का आशय उन चार नगरों (सूरत, बम्बई, मद्रास, एवं कलकत्ता) से था जिसका शासन प्रारम्भिक अवस्था में ‘गवर्नर एण्ड कौंसिल’ को सौंपा गया था। इस काल में कम्पनी ने अपने व्यापारिक केन्द्र की स्थापना भारतीय शासकों की अनुमति से की थी किन्तु धीरे – धीरे कम्पनी का व्यापारिक दृष्टिकोण बदलने लगा और वह भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करने का विचार करने लगी।
  • सन् 1600 ई. के राजपत्र ने जहाँ व्यापारिक कम्पनी को गठित किया वहीं 1609 ई. के राजपत्र ने इस कम्पनी की व्यापार करने की अवधि असीमित कर दी और कम्पनी को मार्शल लॉ घोषित करने का अधिकार भी दे दिया गया।

1661 ई. का राजपत्र (चार्टर)

जारी.. 

                     मिलते है हम अगले दिन, '1661 ई. का राजपत्र (चार्टर)' के विषय पर चर्चा करने के लिये.. 

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