पलायन करने वाली जनता के लिए अपेक्षित नीति की आवश्यकता

भारत में, जनता तेजी से नगरों की ओर पलायन कर रही है। एक अध्ययन के अनुसार प्रति मिनट 25-30 लोग, गांवों से शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। यह पलायन बेहतर जीविका के साधन, और जीवन स्तर में सुधार के लक्ष्य की दृष्टि से किया जाता है। इसके पीछे वर्तमान जीवन पद्धति से असंतोष होना भी एक बड़ा कारण है। इस असंतोष के पीछे प्राकृतिक आपदा एवं कृषि से जुड़कर बेरोजगार होना या रोजगार के बहुत कम अवसर प्राप्त होना, एक महत्वपूर्ण कारण है। एक ओर गाँवों में कृषि-जनित असंतोष है, तो दूसरी ओर शहरों में कमाई के बेहतर स्रोत हैं। यही अंतरराज्यीय या राज्य के अंदर पलायन का कारण है।

पलायन की दुखती रग

बेहतर जीवन की आस में पलायन कर लिया जाता है। गंतव्य पर पहुँचकर पता चलता है कि श्रम बाजार में अपेक्षित कौशल का प्रवासियों में अभाव है। इसके कई दुष्परिणाम सामने आते हैं।

देश के औपचारिक क्षेत्र में इतनी क्षमता नहीं है कि वह प्रवासी के रूप में प्रतिदिन आने वाले अकुशल ग्रामीणों को रोजगार उपलब्ध करा सके। इसके परिणामस्वरूप अनौपचारिक क्षेत्र में श्रम की उपलब्धता बढ़ती जा रही है। शहरी अनौपचारिक अर्थव्यवस्था से जुड़ने वाले ये श्रमिक अथाह गरीबी और असुरक्षा के वातावरण में जीवनयापन करने को मजबूर हो जाते हैं। भारत जैसे देश में इस प्रकार की अर्थव्यवस्था, एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया बन गई है। सालों से चलते रहने के कारण इसने शहरी बेरोजगारी को बहुत अधिक बढ़ा दिया है।

2014 के डाटा के अनुसार प्रवासी श्रमिकों के साथ काफी भेदभाव भी किया जाता है। स्थायी निवासियों की तुलना में वे केवल दो तिहाई कमाई कर पाते हैं।

शहरों तक आने, वहाँ रहने-खाने और रोजगार का साधन ढूंढने तक, उनको काफी पैसा खर्च करना पड़ जाता है।

बाहरी व्यक्ति होने के कारण, उन्हें राज्य द्वारा प्रदत्त स्वास्थ्य व शैक्षिक सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पाता है। इसकी पूर्ति के लिए वे अपने मालिक से उधार लेते हैं। बार-बार ऋण लेने से एक दिन उनकी गाँव की संपत्ति बिकने की नौबत आ जाती है।

अनौपचारिक श्रम बाजार में काम करते हुए इन प्रवासियों को सामाजिक अलगाव का भी सामना करना पड़ता है। शहरों में आने पर इनके मूल निवास, श्रम के प्रकार आदि के आधार पर इनके साथ व्यवहार किया जाता है।
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