लोकसभा और विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन करने के लिए न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह की अध्यक्षता में चौथा परिसीमन आयोग का गठन वर्ष 2002 में किया गया। आयोग ने अपना कार्य 2004 में प्रारंभ किया।प्रारंभ में परिसीमन का कार्य 1991 की जनगणना के आधार पर किया जाना था, परंतु 23 अप्रैल 2002 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इससे संबंधित एक संशोधन विधेयक को अनुमोदित करते हुए यह निर्धारित किया कि निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन अब 2001 की जनगणना के आधार पर किया जाएगा। इसके लिए परिसीमन अधिनियम (87 वां संशोधन) अधिनियम 2003 को अधि नियंत्रित किया गया।निर्वाचन क्षेत्रों का यह परिसीमन 30 वर्षों के पश्चात न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह की अध्यक्षता वाले चौथे परिसीमन आयोग ने अपना कार्यकाल 31 मई 2008 को समाप्त घोषित किया। हालांकि आयोग का कार्यकाल 31 जुलाई 2008 तक निर्धारित था। आयोग ने अपने कार्यकाल में लोकसभा के 543 एवं 24 विधानसभाओं के 4120 निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन किया। पांच राज्यों असम ,अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, नागालैंड और झारखंड में परिसीमन नहीं किया जा सका, जबकि जम्मू कश्मीर के लिए से लागू नहीं किया गया था।इन चार राज्यों को छोड़कर शेष सभी राज्यों ने नए परिसीमन के आधार पर मतदाता सूचियां तैयार की गई हैं।
परिसीमन आयोग ने सरकार से यह संस्तुति की है कि अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों के लिए रोटेशन लागू करना चाहिए।इसके लिए 2002 के परिसीमन अधिनियम के साथ साथ संविधान में भी संशोधन करना होगा। इसके साथ ही आयोग ने अब प्रति 10 वर्ष बाद नई जनगणना के आधार पर परसीमन कराने की सिफारिश की है। आयोग ने लोकतंत्र के तीन चरणों पंचायत, विधानसभा और लोकसभा के निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन शुभम बनाए रखने के लिए आगामी जनगणना पंचायत के आधार पर कराने की संस्तुति की है। आयोग की सिफारिश उसकी रिपोर्ट का भाग नहीं है, बताइए सरकार के लिए बाध्यकारी नहीं है। देश में पहला परिसीमन आयोग 1952 में दूसरा,1962 में,तीसरा 1973 में गठित किया गया था