प्रधानमंत्री की योग्यता के संबंध में संविधान में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं किया गया है,लेकिन इतना अवश्य कहा गया है कि प्रधानमंत्री लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल का नेता होगा। लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल का नेता होने के लिए आवश्यक है कि नेता लोकसभा का सदस्य हो। इसीलिए प्रधानमंत्री को साधारणत: लोकसभा का सदस्य होने की योग्यता रखनी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति, जो कि लोकसभा का सदस्य नहीं है, प्रधानमंत्री के पद पर नियुक्त किया जाता है तो उसे 6 माह के अंतर्गत लोकसभा का सदस्य होना पड़ता है। उदाहरण के लिए, 1967 में इंदिरा गांधी (उस समय राज्यसभा कि सदस्य थी) तथा 1991 में जब पी वी नरसिंह राव प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त किए गए, तब वे लोकसभा के सदस्य नहीं थे,लेकिन उन्होंने छह माह के अंतर्गत लोकसभा का चुनाव लड़कर संसद की सदस्यता प्राप्त की थी। प्रधानमंत्री के लिए लोकसभा की सदस्यता अनिवार्य नहीं है।उसे वस्तुतः संसद के दोनों सदनों में से किसी एक सदन अर्थात लोकसभा या राज्यसभा का सदस्य अनिवार्यत: होना चाहिए। 1997 में प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त इंद्र कुमार गुजराल बाद में 2004 में नियुक्त प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह राज्यसभा के सदस्य रहे हैं।
संसद के किस सदन का सदस्य ना होने पर भी कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त हो सकता है।अनुच्छेद 75(5)के अनुसार यदि कोई व्यक्ति 6 माह के अंदर संसद के किसी सदन का सदस्य नहीं बन जाता है,तो वह प्रधानमंत्री पद पर बने नहीं रह सकता है। इसका अर्थ है कि बाहरी व्यक्ति प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त हो सकता है। लेकिन उसे 6 महीने के भीतर संसद के किस सदन का सदस्य बन जाना चाहिए। यदि वह इस अवधि के भीतर संसद के किसी सदन का सदस्य नहीं बन पाता है तो उसे अपने पद से इस्तीफा दे देना पड़ेगा। ध्यातव्य है कि 1996 में जब एच .डी देवगौड़ा प्रधानमंत्री नियुक्त हुए थे तभी किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे, उनकी नियुक्ति को एसपी आनंद नहीं यह सुधार पर न्यायालय में चुनौती दी थी कि इससे अनुच्छेद 14 21,75 का उल्लंघन होता है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले पर अपना निर्णय सुनाते हुए कहा कि अनुच्छेद 75 (5) के अनुसार यह नियुक्ति विधि मान्य अ