क्रमशः..
Day - 03
1661 ई. का राजपत्र (चार्टर)
- कम्पनी को व्यापार करते हुए यद्यपि 60 वर्ष हो चुके थे, किंतु इसके समक्ष एक समस्या उन अंग्रेजो को काबू में करने की थी जो इसके कर्मचारी नही थे, परंतु अंग्रेजी बस्तियों में रहकर व्यापार किया करते थे। अतः कम्पनी ने ब्रिटिश क्राउन से मांग की थी कि उसे ऐसे अधिकार दिये जाये ताकि वह अपनी बस्तियों व संस्थानों मे रहने वाले अंग्रेजो को व्यवस्था के अधीनस्थ रख सके और कानून को तोड़ने वाले व्यक्तियों को दण्डित कर सकें।
- ब्रिटिश क्राउन ने 3 अप्रैल 1661 ई. को 1661 ई. का राजपत्र (चार्टर) जारी किया जिसमें कम्पनी के न्याय-सम्बन्धी अधिकारियों की व्यवस्था की गई। अतएव इसे ‘न्यायिक राजपत्र’ कहा गया।
- इस राजपत्र ने कम्पनी को यह अधिकार प्रदान किया कि वह सारे किलों, बस्तियों व नगरों पर प्रशासन सुदृढ़ कर सके तथा प्रशासन के सुविधा के लिए किसी भी भारतिय शासक से शांति व युध्द कर सकें।
1683 ई. का राजपत्र (चार्टर)
- सन् 1600 ई. के राजपत्र द्वारा कम्पनी को प्राप्त सुरक्षित व्यापारिक एकाधिकार का उल्लंघनकारियों के द्वारा वृहत रुप में उल्लंघन किया जा रहा था। इस समस्या के त्वरित निदान के लिए 9 अगस्त, 1683 ई. को चार्ल्स द्वितीय द्वारा सन् 1683 ई. का राजपत्र (चार्टर) जारी किया गया।
- समुद्रीय लुटेरे कम्पनी को अपार क्षति पहुँचा रहे थे जिन्हे सजा देने के लिए उपयुक्त न्यायालय नही थे। सन् 1683 ई. के राजपत्र का उद्देश्य इस कमी को पूरा करना था।
- इस राजपत्र के द्वारा कम्पनी को यह अधिकार दिया गया कि किसी एक स्थान पर या अन्य कई स्थानों पर एक या अन्य ऐसी अदालतें स्थापित कर सके जिन्हें ‘एडमिरेल्टी कोर्ट’ कहा गया।
- ‘एडमिरेल्टी कोर्ट’ को अधिकार था कि वह क्षेत्रीय सीमा के अन्तर्गत होने वाले प्रत्येक सागरीय व वाणिज्य सम्बन्धी मामलों में निर्णय कर सके। यह न्यायालय अपना निर्णय व्यापारियों की व्यवस्थाओं रुढ़ियों तथा न्याय, साम्य व शुध्द अन्तःकरण के सिध्दान्तों पर करती थी।
- सन् 1694 ई. में ‘हाउस ऑफ कामन्स’ में पारित एक प्रस्ताव के अनुसार भारत से व्यापार करने की छूट सभी ब्रिटिश नागारिकों को प्रदान कर दी गई, जब तक कि उन्हें पार्लियामेंट के किसी कानून के द्वारा मना न कर दिया जाये।
- सन् 1698 ई. के अधिनियम के द्वारा ‘जनरल सोसाइटी’ नामक कम्पनी की स्थापना की गई जिसे पुरानी कम्पनी के समान सभी व्यापारिक सुविधायें प्रदान की गई।
- कुछ प्रतिद्वंदी अंग्रेजो ने ‘इंग्लिश कम्पनी ऑफ मर्चेन्ट्स’ के नाम से एक ज्वाइंट स्टाक कम्पनी की स्थापना की। राजस्व सम्बन्धी कठिनाईयों के बावजूद भी वह इंग्लिश कम्पनी पुरानी लंदन कम्पनी की प्रतिद्वंदी साबित हुई।
- ब्रिटिश संसद ने मंत्रिपरिषद् के दबाव में सन् 1702 ई. के प्रस्ताव द्वारा दोनों कम्पनीयों के एक-दूसरे में मिश्रित हो जाना स्वीकार किया। सम्मिलन के पश्चात् स्थापित कम्पनी का नाम ‘दि यूनाइटेड कम्पनी ऑफ मर्चेण्ट्स ऑफ इंग्लैण्ड ट्रेडिंग इन टू ईस्ट इण्डीज’ रखा गया।
- कम्पनी का वैधानिक एकाधिकार सन् 1793 ई. तक सुरक्षित रखा गया। इस कम्पनी को ‘ईस्ट इण्डिया कम्पनी’ कहा गया, जिसने 5 वर्षो के अंदर ही अपनी फैक्टरियों के किरायेदार के स्तर से ऊपर उठकर अधिराष्ट्र स्तर प्राप्त कर लिया।
जारी..
मिलते है हम अगले दिन, '1726 ई. का राजपत्र (चार्टर)' के विषय पर चर्चा करने के लिये..