बंगाल विभाजन के निर्णय की घोषणा 19 जुलाई 1905को भारत के तत्कालीन वाइसराय लार्ड कर्जन द्वारा की गयी थी। एक मुस्लिम बहुल प्रान्त का सृजन करने के उद्देश्य से ही भारत के बंगाल को दो भागों में बाँट दिये जाने का निर्णय लिया गया था। विभाजन 16 अक्टूबर 1905 से प्रभावी हुआ। इतिहास में इसे बंगभंग के नाम से भी जाना जाता है। यह अंग्रेजों की "फूट डालो - राज करो" वाली नीति का ही एक अंग था। अत: इसके विरोध में 1908 ई. में सम्पूर्ण देश में `बंग-भंग' आन्दोलन शुरु हो गया। इस विभाजन के कारण उत्पन्न उच्च स्तरीय राजनीतिक अशांति के कारण 1911 में दोनो तरफ की भारतीय जनता के दबाव की वजह से बंगाल के पूर्वी एवं पश्चिमी हिस्से पुनः एक हो गए।
आंदोलन की उत्तपत्ति :-
बंगाल प्रान्त का क्षेत्रफल 489,500 वर्ग किलोमीटर और जनसंख्या 8 करोड़ से ज्यादा थी। पूर्वी बंगाल भौगोलिक रूप से एवं कम संचार साधनों के कारण पश्चिमी बंगाल से लगभग अलग-थलग था। 1836 में, ऊपरी प्रांतों को एक लेफ्टिनेंट गवर्नर के शासन के अंतर्गत कर दिया गया और 1854 में गवर्नर जनरल-इन-काउंसिल को बंगाल के प्रत्यक्ष प्रशासन से मुक्त कर दिया गया। अलग चीफ-कमिश्नरशिप बनाने के लिए 1874 में आसाम को सिलहट सहित, बंगाल से अलग कर दिया गया और बाद में 1898 में लुशाई हिल्स को भी इसमें शामिल कर दिया गया। बंगाल जैसे बड़े और इतनी अधिक आबादी वाले प्रान्त का प्रबंधन बहुत कठिन था।
1905 में 16 अक्टूबर को भारत के तत्कालीन वॉयसराय लार्ड कर्जन द्वारा बंगाल का विभाजन किया गया। विभाजन को प्रशासकीय कार्यों के लिए प्रोत्साहित किया गया, बंगाल लगभग फ्रांस जितना बड़ा था जबकि उसकी आबादी फ्रांस से कहीं अधिक थी। ऐसा सोचा गया कि पूर्वी क्षेत्र उपेक्षित और उचित रूप से शासित नहीं था। प्रान्त के बँटवारे से पूर्वीय क्षेत्र में बेहतर प्रशासन स्थापित किया जा सकता था जिससे अंततः वहाँ की जनता स्कूल और रोजगार के मौकों से लाभान्वित होती। हालाँकि, विभाजन की योजना के पीछे अन्य उद्देश्य भी छिपे थे। बंगाली हिंदू, शासन में अधिक से अधिक भागीदारी के लिए राजनैतिक आंदोलन में अग्रणी थे, अतः अब पूर्व में मुस्लिमों का वर्चस्व बढ़ने से उनकी स्थिति कमजोर हो रही थी| हिंदू और मुस्लिम दोनो ही ने विभाजन का विरोध किया| विभाजन के बाद, हालाँकि, लगभग राष्ट्रीय स्तर पर ब्रिटिश विरोधी आंदोलन प्रबल हुआ जिसमें कि अहिंसक और हिंसक विरोध प्रदर्शन, बहिष्कार और यहाँ तक कि पश्चिम बंगाल के नए प्रांत के राज्यपाल की हत्या का प्रयास भी शामिल था।
प्रबल सार्वजनिक विरोध के बावजूद 20 जुलाई 1905 को वंगभंग के प्रस्ताव पर भारत सचिव का ठप्पा लग गया। राजशाही, ढाका तथा चटगाँव कमिश्नरियों को आसाम के साथ मिलाकर एक प्रांत बनाया गया, जिसका नाम पूर्ववंग और आसाम रखा गया और बाकी हिस्सा यानी प्रेसीडेन्सी और वर्धमान कमिश्नरियाँ बिहार, उड़ और इसका कोई आधार था।
इस अवसर पर हिंदुओं और मुसलमानों को यह कहकर लड़ाने की चेष्टा की गई कि इस विभाजन से मुसलमानों को फायदा है क्योंकि पूर्ववंग और आसाम में उन्हीं का बहुमत रहेगा। ढाका के नवाब ने पहले विरोध किया था, पर जब वंगभंग हो गया तो वह उसके पक्ष में हो गए। सर जोजेफ बैमफील्ड फुलर (Joseph Bamfylde Fuller) पूर्ववंग और आसाम के नए लेफ्टिनैंट गवर्नर बने। कहा जाता है, उन्होंने कई जगह खुल्लमखुल्ला कहा कि हिंदू और मुसलमान उनकी दो बीबियाँ हैं, इनमें से मुसलमान उनकी चहेती हैं। इस कथन का आशय स्पष्ट था।
वंगभंग का उद्देश्य प्रशासन की सुविधा उत्पन्न करना नहीं था, जैसा दावा किया गया था, बल्कि इसके दो स्पष्ट उद्देश्य थे, एक हिंदू मुसलमान को लड़ाना और दूसरे नवजाग्रत बंगाल को चोट पहुंचाना। यदि गहराई से देखा जाए तो यहीं से पाकिस्तान का बीजारोपण हुआ। मुस्लिम लीग के 1906 के अधिवेशन में जो प्रस्ताव पास हुए, उनमें से एक यह भी था कि वंगभंग मुसलमानों के लिए अच्छा है और जो लोग इसके विरुद्ध आंदोलन करते हैं, वे गलत काम करते हैं और वे मुसलमानों को नुक्सान पहुंचाते हैं। बाद को चलकर लीग के 1908 के अधिवेशन में भी यह प्रस्ताव पारित हुआ कि कांग्रेस ने वंगभंग के विरोध का जो प्रस्ताव रखा है, वह स्वीकृति के योग्य नहीं।
नए प्रान्त में पहाड़ी राज्य त्रिपुरा, चिट्टागांग मंडल, ढाका और राजशाही (दार्जिलिंग को छोड़ कर) शामिल हुए और मालदा जिले को आसाम प्रान्त में मिला दिया गया। बंगाल को न केवल इन बड़े पूर्वी प्रदेशों को छोड़ना पड़ा, बल्कि पाँच हिंदी भाषी राज्यों को भी मध्य प्रांत के लिए गँवाना पड़ा था। पश्चिम की तरफ से इसे मध्य प्रान्त से संबलपुर और पाँच छोटे उड़िया-भाषी राज्य प्रदान किये गए। बंगाल के पास141,580 वर्ग मील (366,700 कि॰मी2) क्षेत्रफल और पाँच करोड़ चालीस लाख की जनसंख्या ही बची थी, जिसमें चार करोड़ बीस लाख हिन्दू और नब्बे लाख मुस्लिम थे।
बंग- भंग के विरुद्ध आंदोलन :-
बंगभंग के विरुद्ध बंगाल के बाहर बहुत भारी आंदोलन हुआ। इस आंदोलन में देश के प्रसिद्ध कवियों और साहित्यकारों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस आंदोलन ने बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के वंदे मातरम् गीत को नई बुलंदियाँ प्रदान की। उस समय बंगाल को बाँट देने का अंग्रेजी कुचक्र तो टूटा ही, सारे देश में और विदेशों में इसे असाधारण ख्याति मिली। जर्मन और कनाडा जैसे देश भी इससे प्रभावित हुए। कामागाटामारू नामक जहाज के झंडे पर 'वन्दे मातरम्' अंकित किया गया था। तब से सन् 1930 के नमक सत्याग्रह और सन् 1942 के 'भारत छोड़ो' आन्दोलन तक सभी सम्प्रदायों से उभरे युवा स्वतंत्रता संग्राम सैनिकों का सबसे प्रेरक और प्रिय नारा रहा 'वन्दे मातरम्'। भारत वासियों की अन्तर्भावना इसे नैतिक आधार पर भली प्रकार स्वीकार कर चुकी थी।
बंग -भंग की समाप्ति :-
सन् 1911 के 12 दिसम्बर को दिल्ली में एक दरबार हुआ, जिसमें सम्राट् पंचम जार्ज, सम्राज्ञी मेरी तथा भारत सचिव लार्ड क्रू आए थे। इस दरबार के अवसर पर एक राजकीय घोषणा-द्वारा पश्चिम और पूर्व वंग के बँगला भाषी इलाकों को एक प्रांत में लाने का आदेश किया गया। राजधानी कलकत्ते से दिल्ली में हटा दी गई। मुस्लिम लीग का 1912 का वार्षिक अधिवेशन नवाब सलीमुल्ला खाँ के सभापतित्व में ढाके में हुआ। इसमें नवाब ने अपने अभिभाषण में हिंदुओं की शोरिशों और सरकार की बेमुरव्वतियों का बड़ा जोरदार चित्र खींचा और वंगभंग रद्द करने का विरोध प्रकट किया।