गौ माता की रक्षा के नाम पर होने वाली हत्याएं, हमारे देश के लिए एक चेतावनी है। ऐसा करके देश के लोगों की एकता और नैतिकता को छिन्न-भिन्न किया जा रहा है। एक बात ऐसी है, जिस पर हम सब सहमत होंगे कि हम यानी भारत के नागरिकों को विचारों, अभिव्यक्ति, आस्था, विश्वास और पूजा की स्वतंत्रता का समान अधिकार दिया गया है। यह सब संविधान की प्रस्तावना में ही एक वायदे के रूप में हमने स्वयं को प्रदान किया है। स्वतंत्रता का यह विचार ही भारत की आत्मा है। अतः प्रत्येक को गाय की अवधारणा का अपने तरीके से निर्माण करने की संवैधानिक स्वतंत्रता है।
संविधान निर्माताओं ने राज्यों को दिए नीति-निर्देशक सिद्धांतों में गौवध एवं अन्य दुधारू पशुओं के वध पर रोक लगाने का परामर्श भी दिया है। यही सिद्धांत, अब हमारे राष्ट्र के ताने-बाने को बिखेरने पर तुला हुआ है। इसने छोटे-मोटे कट्टरपंथियों की आकांक्षाओं को इस प्रकार से हवा दे दी है कि वे निर्दोष लोगों की जान लेने से पहले जरा भी नहीं सोचते हैं। इसने पुलिस की भी एक ऐसी जमात खड़ी कर दी है, जो अवैध कसाईखानों के संरक्षक बन गए हैं।
इस सब हंगामें में गाय की और बेकद्री होती जा रही है। असहाय किसान अपनी बूढ़ी गाय को सड़कों पर लावारिस छोड़ने को मजबूर हो गए हैं। ये लावारिस गाएं सड़कों पर पड़े ढेरों प्लास्टिक खाकर एक दर्दनाक मौत मरने को मजबूर हो रही हैं। क्या इसमें कोई पाप नहीं है?