भारतीय धन का बहिर्गमन-

रेल मार्गो के निर्माण और आधुनिक क़िस्म के जहाज़ बनने से भारत के विदेश व्यापार में वृद्धि हुइ .

.स्वेज नहर खुल जाने से भारत और युरोप के मध्य की दूरी कम हो गयी और इससे इंग्लैंड और भारत के बीच वस्तुओं के आयात में वृद्धि हुई |19वीं सदी के अंत में भारत प्रमुख रूप से कपास ,जुट , चावल ,गेहूं ,बीज और चमड़े जैसी वस्तुएं निर्यात होने लगी बाहर जाने वाली वस्तुओं में जूट से बनी चीजें सबसे महत्वपूर्ण थी बाहर से प्रमुख रूप से मशीनें धात की चीजें कपड़े और अन्य उत्पादित चीजें आयात की जाती थी |बीसवीं सदी में भारत का विदेश व्यापार तेजी से बड़ा आयात निर्यात की दशा और वस्तुओं की किस्मों में परिवर्तन हुआ|

19वीं सदी में भारत का विदेश व्यापार मुख्य रूप से इंग्लैंड के साथ ही था| बीसवीं सदी में अमेरिका जापान जर्मनी और कुछ अन्य देशों के साथ भी व्यापार संबंध स्थापित हुए देशों के साथ व्यापार में वृद्धि होती गई इस बीच आयात एवं निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में भी कुछ परिवर्तन हुआ जैसे जैसे भारतीय उद्योगों का विकास होता गया वैसे-वैसे उत्पादित वस्तुओं के आप में कमी आई और भारत अपनी उत्पादित वस्तुओं का आयात करने लगा इस लेकिन इसका यह अर्थ नहीं था कि भारत आर्थिक विकास के उच्च स्तर पर पहुंच गया था ब्रिटिश शासन के पूरे दौर में भारत का दाम लगातार इंग्लैंड पहुंचता विश्वामित्र के उद्योग और व्यापार से होने वाला लाभ इंग्लैंड भेजा जाता था भारत सरकार द्वारा वसूल किए गए राजस्व का एक बड़ा हिस्सा भी गृह प्रवेश शुल्क के नाम पर इंग्लैंड पहुंचता था भारत में शासन करने के लिए इंग्लैंड में जो कुछ भी खर्च होता था जैसे कि भारत सचिव के कार्यालय का खर्च हुआ सब भारत के राजस्व से अदा किया जाता था भारत के ब्रिटिश अधिकारी अपने वेतन का एक हिस्सा इंग्लैंड भेजते थे तथा सेवा से अवकाश ग्रहण करने पर उन्हें उनकी पेंशन भारत से भेजी जाती थी एक अनुमान के अनुसार 19वीं सदी के अंतिम दशक में भारत में वसूल किए गए राजस्व का एक तिहाई भाग इंग्लैंड पहुंचा था|

Posted on by