पिंजड़े को तोड़ना जरूरी है

केन्द्रीय जाँच ब्यूरो या सीबीआई भारत की प्रमुख जाँच एजेंसी है। यह आपराधिक एवं राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हुए भिन्न-भिन्न प्रकार के मामलों की जाँच करने के लिए गठित की गई है। राजनैतिक रूप से संवेदनशील मामलों की जाँच करते हुए सीबीआई को अनेक बार विवादों और आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है। महत्वपूर्ण मामलों में सी बी आई ने सदा ही सरकार का अनुसरण किया है। यही कारण है कि इसे ‘पिंजरे में बंद तोते’ की संज्ञा भी दी गई है। पहली बार ऐसा हुआ है कि अपने ही अधिकारियों की आपसी तनातनी में सीबीआई दलदल में धंसती नजर आ रही है।

बहुत समय से उच्चतम न्यायालय, सीबीआई को राजनैतिक दबावों से अलग रखने का प्रयास कर रहा है। इसी प्रक्रिया में उसे स्वायत्तता प्रदान की गई।

  • 1998 में विनीत नारायण बनाम केन्द्र सरकार के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह निश्चित कर दिया था कि सीबीआई के निदेशक की नियुक्ति केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त, अन्य सतर्कता आयुक्तों, गृह सचिव एवं सचिव (कार्मिक विभाग) की एक संयुक्त समिति करेगी। निदेशक का कार्यकाल कम से कम दो वर्ष का होगा।
  • सीबीआई के ऊपर नजर रखने के लिए केन्द्रीय सतर्कता आयोग को अधिकृत किया गया था। इस प्रकार की निगरानी या जाँच-पड़ताल का काम भ्रष्टाचार निरोधक कानून के अंतर्गत किया जा सकता था।

ऐसा आदेश देने वाले न्यायमूर्ति वर्मा ने 2009 में सीबीआई पर एक बार फिर से टिप्पणी करते हुए कहा था कि, ‘‘शक्तिशाली व्यक्तियों के विरुद्ध चलने वाले मामलों में सीबीआई, अभी भी लोगों को निराश कर रही है।’’

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