सामाजिक कानून

लंबे समय तक ब्रिटिश शासकों ने सामाजिक कुरीतियों पर कोई ध्यान नहीं दिया उनका मुख्य उद्देश्य था भारत का आर्थिक शोषण करना मां की सामाजिक बुराइयों को दूर करना इस काल में भारत आए कुछ ब्रिटिश प्रशासक मानवतावादी और सुधारवादी विचारों से प्रेरित थे उन्हीं के प्रयासों से 19वीं सदी के पहले भाग में भारत में कुछ मानवतावादी कदम उठाए गए इनमें से कुछ भारतीयों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की उस समय देश के कुछ भागों की कुछ जातियों में शिशु कन्या वध की प्रथा प्रचलित थी कन्या के जन्म लेते हैं उसे मार डाला जाता था उस समय की सामाजिक प्रथाओं के अनुसार कन्याओं का विवाह अपनी बिरादरी में ही करना पड़ता था कन्या के विवाह में पिता को बहुत ज्यादा खर्च करना पड़ता था करने का अविवाहित रहना परिवार के लिए कलंक की बात समझी जाती थी ऐसा ना हो कि इसलिए कई कन्याओं का बचपन में ही बंद कर दिया जाता था कभी कभी धार्मिक मान्यताओं को पूरा करने के लिए नवजात पुत्र और पुत्री दोनों को ही पवित्र नदियों में प्रवाहित कर दिया जाता था इस कुप्रथा को बंद करने के लिए सरकार ने कानून बनाए भारतीय समाज में स्त्रियों की दशा बड़ी दयनीय थी वह कर दिया जाता था पुनर्विवाह नहीं होता था जिस कारण उन्हें करना पड़ता था हिंदुओं की कुछ कथित जातियों में प्रचलित प्रथा थी जिसके अनुसार मृत व्यक्ति की पत्नी को पति के साथ चिता में जलाकर आहुति देनी पड़ती थी इस कुप्रथा को सती का सती प्रथा कहते हैं 1829 में बने एक कानून के इस क्रूर प्रथा पर रोक लगा दी गई या कानून गवर्नर जनरल विलियम बेंटिक लागू हुआ राजा राम मोहन राय द्वारा प्रारंभ किए गए दीर्घकालिक को बंद करने में सहायता मिली एक अन्य समाज सुधारक ईश्वर चंद्र विद्यासागर थे जिनके प्रयासों से सरकार ने 7 दिसंबर  1856 में विधवा पुनर्विवाह कानून बनाया भारत में व्यापार भी सतत रूप से प्रचलित था कि या बड़े पैमाने पर नहीं होता था गरीबी के कारण लोग बच्चों को बेचने के लिए विवश होते थे गुलामों से ज्यादा घरेलू काम कराए जाते थे कभी कभी सपनों में भी भेजा जाता था 1843 में एक कानून बनाकर दास प्रथा पर पाबंदी लगा दी गई सरकार का मुख्य प्रयास ब्रिटिश हितों की रक्षा और अभिवृद्धि करना था दूरगामी सामाजिक सुधारों में उसकी ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी भारतीयों ने ही प्रयास किए थे|
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