समुद्रगुप्त (गुप्त वंश 350- 375 ई ०)
हरिसेण द्वारा रचित प्रयाग प्रशस्ति से उसके जीवन संबंधी जानकारी की प्राप्ति होती है । उसने परक्रमांक की उपाधि धारण की ,उसने दक्षिण के 112 राजाओं को पराजित कर उन्हें मुक्त करके ग्रहणमोक्षानुग्रह की नीति चलाई अंग्रेजी लेखक हम भी है बी०ए स्मिथ ने उन्हें भारतीय नेपोलियन की संज्ञा दी है।
हर्ष वर्धन (वर्धन वंश 647 ई०) राजपूत एवं शिलादित्य की उपाधि धारण की, उनके दरबारी कवि बाणभट्ट ने हर्ष रचित की रचना की, पुलकेशिन द्वितीय के खिलाफ पराजित हुआ, अपने बहन राज्यश्री को शशांक से मुक्त कराया, चीनी नरेश ताई सुंग के दरबार में एक दूत भेजा, हु एन सांग उसके दरबार में आया तथा अन्य धर्मों पर महायान की श्रेष्ठता साबित करने के लिए उस की अध्यक्षता में कन्नौज में एक सभा का आयोजन भी किया।
महमूद गजनवी (गजनवी वंश 1000 --1026 इ०)
मध्य एशिया से आया एक लुटेरा ,हेनरी एलियट के अनुसार भारत पर 17 बार आक्रमण किया ,आक्रमण का मुख्य उद्देश्य धन एवं स्वर्ण से पूर्ण मंदिरों को लूटना था। उसने प्रथम आक्रमण 1000 में सिंध के राजा जयपाल पर एवं 1026 में अंतिम आक्रमण जाटों के विरुद्ध किया। 1025 में उसने सोमनाथ के मंदिर को लूटा। उसके साथ अलबरूनी उत्बी बबैहाकी तथा फिरदौसी जैसे विद्वान साथ आये। अलबरूनी की किताब बुलहिंद एवं फिरदौसी कृत शाहनामा प्रसिद्ध रचनाएं हैं
मोहम्मद गौरी (गौरी वंश 1192 -1206 ई०)
यह भी मध्य एशिया से आया एक आक्रांता था। इसने 1178 में भारतीय गुजरात के राजा मूलराज द्वितीय पर आक्रमण किया जहां उसे पराजय का मुंह देखना पड़ा । 1191 में तराई के प्रथम युद्ध में पृथ्वीराज चौहान से पराजित हुआ, लेकिन 1192 में तराई के द्वितीय युद्ध में उसे पराजित किया। स्वयं शासन ना कर अपने दो सरदारों कुतुबुद्दीन ऐबक एवं बख्तियार खिलजी के माध्यम से भारतीय क्षेत्र पर प्रभाव रखा । 1194 में चंदावर के युद्ध में जयचंद को पराजित किया । 1205 में खोखरों के विरूद्ध अभियान में उसकी हत्या कर दी गई।