भारत के लिए दक्षिण एशियाई देशों का महत्व (part 1)

भारत जैसी उभरती हुई शक्ति के लिए यह और भी मायने रखते हैं की दक्षिण एशियाई देशों का संबंध भारत के साथ कैसा है। वर्तमान प्रधानमंत्री के 2014 में शपथ ग्रहण के साथ ही पड़ोसी देशों को प्राथमिकता देने की नीति की शुरूआत हो गई थी। तब से लेकर आज तक भारत सरकार लगातार इस पर अमल करती आ रही है। इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए वर्ष के अंत तक प्रधानमंत्री का नेपाल, भूटान और मालदीव जैसे पड़ोसी देशों की यात्रा का कार्यक्रम तय किया गया है।

पड़ोसी देशों के प्रति सौहार्दपूर्ण नीति को बनाए रखने में चीन एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आ रहा है। चीन की वन बेल्ट, वन रोड़ नीति का कई दक्षिण एशियाई देश विरोध कर रहे हैं, क्योंकि इससे हिन्द महासागर में उसकी जगह बन जाएगी। यही कारण है कि इस क्षेत्र में चीन अपने लिए कुछ मित्र तैयार करना चाह रहा है। इस नीति के तहत उसने नेपाल को अपनी क्षेत्रीय प्राथमिकताएं बदलने के लिए किसी प्रकार से प्रभावित कर लिया है। इसका साक्ष्य इस बात से मिलता है कि नेपाल ने अगस्त में सम्पन्न बिम्सटेक (बे ऑफ बंगाल इनिशिएटिव फॉर मल्टी सेक्टोरल टेक्निकल एण्ड इकॉनॉमिक कॉर्पोरेशन) सम्मेलन के बाद, इन देशों के पूना में होने वाले सैन्य अभ्यास के लिए अपने दल को नहीं भेजा।

पड़ोसियों को प्राथमिकता देने की भारत की विदेश नीति के साढ़े चार वर्षों के दौर में पाकिस्तान एक ऐसा देश रहा, जिसने भारत की दोस्ती के प्रति दुश्मनी का रवैया अपनाया है। इस मामले में सार्क संगठन भी अप्रभावी सिद्ध हुआ है। अतः पाकिस्तान को छोड़कर, भारत ने अन्य सभी पड़ोसी देशों को अपनी आर्थिक प्रगति का भागीदार बनाते हुए, उनके लिए न्यूनतम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराने; संपर्क साधनों का जाल बिछाने एवं बंगाल की खाड़ी में सुरक्षित बाजार उपलब्ध कराने के अथक प्रयास किए हैं। इसके साथ ही प्रधानमंत्री मोदी ने दक्षिण एशियाई देशों की नियमित यात्राएं की हैं, और इन देशों में प्रमुखों की आवभगत भी की है।

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