भारत के लिए दक्षिण एशियाई देशों का महत्व (part 2)

प्रत्येक देश को अपने अंतरराष्ट्रीय संबंधों को चुनने की संप्रभुता होती है। चीन के आर्थिक कौशल और विकास की रफ्तार ने अनके दक्षिण एशियाई देशों को उसकी ओर आकर्षित किया है। इसी के चलते 2014 में श्रीलंका ने चीनी पनडुब्बियों का स्वागत किया था। अब नेपाल भी चीन की ओर झुकता दिखाई दे रहा है। मालदीव ने भी चीन के दोस्ताना रवैये का स्वागत किया है।

चीने के साथ हुआ डोकलाम विवाद भारत के लिए एक अग्नि परीक्षा थी। चीन ने चाल चलते हुए भूटान के माध्यम से भारत को संदेश देना चाहा था। परन्तु भूटान ने चीन की प्रभुता के सामने घुटने नहीं टेके। इसी प्रकार बांग्लादेश ने भी चीन के साथ संबंधों में चतुराई दिखाते हुए उससे दूरी बनाए रखी।

म्यांमार ने चीन की बेल्ट रोड़ नीति का विरोध किया है। श्रीलंका ने भी अपनी विदेश नीति को अपेक्षाकृत संतुलित कर लिया है। लेकिन चीन के ऋण से दबे होने के कारण उस पर अभी भी दबाव है।

अफगानिस्तान तो अतिवादियों से दूर ही रहना चाहता है। मालदीव से संबंध और बेहतर होने की उम्मीद की जा सकती है।

दक्षिण एशियाई देशों के साथ इतिहास और जड़ों की समानता ही भारत का स्थान बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं है। भारत को राजनीतिक, कूटनीतिक और आर्थिक स्तर पर ऐसे समाधान और विकल्प ढूंढने होंगे, जो इन देशों में उसकी सफलता को बनाए रख सके। जिससे भारत के विकास में बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगा

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